‘मोदी प्रेम’ में बनारस गये बिल्‍डर रो रहे हैं अब, जानें क्‍यों…

वाराणसी : साल 2014 का प्रारंभ था . देश लोक सभा चुनाव की तैयारियों में रंगने लगा था . मीडिया ने कंफर्म कर दिया था कि नरेन्‍द्र मोदी देश के प्रधान मंत्री बन जायेंगे . मोदी उत्‍त्‍र प्रदेश-बिहार का मन जीत लेने को वाराणसी से लोक सभा चुनाव लड़ने वाले थे . फिर जब चुनाव आयोग ने रणभेरी बजाई, तो नरेन्‍द्र मोदी गुजरात के वड़ोदरा के साथ वाराणसी (बनारस) चुनाव लड़ने को आ ही गये . मोदी के खिलाफ अरविंद केजरीवाल ने भी ताल ठोंक दी,पर सबों को पता था कि शोर जितना भी हो,फतह मोदी की होगी . 

फिर क्‍या था,वाराणसी पर नजर देश-प्रदेश के कई बिल्‍डरों की गई . मान लिया गया कि वाराणसी में मोदी की जीत के साथ ही तरक्‍की की ऐसी राह खुलेगी कि सभी दूसरे शहर पिछड़ जायेंगे . वाराणसी जापान के विकसित शहरों की तरह हो जाएगा . मई,2014 में लोक सभा चुनाव के नतीजे आए . मोदी वाराणसी और वड़ोदरा दोनों लोक सभा क्षेत्रों से जीते . देश के प्रधान मंत्री बन गये . वाराणसी का दिल जीतने को मोदी ने गुजरात की वड़ोदरा लोक सभा सीट छोड़ दी . फिर क्‍या था,वाराणसी के सपनों के पंख को लंबी उड़ान मिल गई .



अब वाराणसी के डेवलपमेंट को लेकर रोज नई बातें होती . कहा जाता कि इतना निवेश आ रहा है . कल-कारखानों की भरमार होने वाली है . रोजगार के लाखों अवसर पैदा होने वाले हैं . विकास इतना तेज होगा कि रहने और आफिस चलाने को वाराणसी में घर-दुकान कम पड़ जायेंगे . माहौल ऐसा बना,तो दूसरे प्रदेशों के बिल्‍डर वाराणसी की ओर बहुत तेजी से कूच कर गए . दिल्‍ली-लखनऊ के बिल्‍डर भी दौड़े आ गए . सबों ने अपने हिसाब से अपने प्रोजेक्‍ट तैयार किए . वाराणसी के रियल स्‍टेट डेवलपमेंट की दिशा की पहचान की गई . संभावित ग्राहकों वाले दूसरे प्रदेशों को भी टारगेट किया गया . 

वाराणसी संकरी और घुमावदार गलियों का शहर है . लेकिन अब तो इसे स्‍मार्ट सिटी बनना था,सभी ऐसा ही समझ रहे थे . मल्‍टी स्‍टोरी अपार्टमेंट का कल्‍चर ठेठ बनारसियों में नहीं है . बिल्‍डर जान रहे थे कि इंडस्‍ट्रीज आयेंगे,तो शहर का डेवलपमेंट दूर तक जाएगा . सो,वे वाराणसी के विस्‍तार की योजना को समझ जल्‍दी में जमीन के सौदे शहर के बाहरी हिस्‍सों में करने लगे . शहर के भीतर कामर्शियल कांप्‍लेक्‍स की प्‍लानिंग की जाने लगी . जमीन के सौदों की प्रतिस्‍पर्द्धा इतनी तेज थी कि वाराणसी के बाहर भी जमीन की कीमत में आग लग गई . रोज बड़ी-बड़ी गाडि़यां जमीनों के प्‍लॉट के पास खड़ी होने लगी . लैंड ब्रोकर की बड़ी जमात तैयार हो गई .

अखबार भी नये प्रोजेक्‍टों के विज्ञापन से भर गये . नक्‍शा पास कराने की होड़ मची . विज्ञापनों के माध्‍यम से दूसरे प्रदेशों में भी ग्राहक तलाशे जाने लगे . लेकिन आज 2017 में हालात बिलकुल बदले हैं . मोदी के चुनाव जीते 3 साल पूरे होने वाले हैं . पॉपुलारिटी भले ही मोदी की कम न हुई हो,पर वाराणसी की तकदीर बहुत नहीं बदली है . कोई ऐसी बड़ी इंडस्‍ट्री नहीं आई कि वाराणसी की सूरत बदल ही दे . अपार्टमेंट कल्‍चर को वाराणसी स्‍वीकारने के मूड में नहीं है .

परिणाम,2014 में वाराणसी की ओर तेजी से दौड़े बिल्‍डर व डेवलपर्स आज बहुत परेशान हैं . कह सकते हैं,रो रहे हैं . बड़ी पूंजी वाराणसी में फंस गई है . प्रोजेक्‍ट की डिमांड है ही नहीं . ऐसे में,मुनाफा की बात दूर कंस्‍ट्रक्‍शन को जारी रखना भी मुश्किल हो गया है . 

बहुत सारे बिल्‍डरों की लैंड डील भी खतरे में पड़ गई है . विशेषकर उनकी जो डेवलपमेंट एग्रीमेंट में गये थे . मांग नहीं होने के कारण प्रोजेक्‍ट समय से शुरु नहीं हुआ . समय गुजरता चला गया . एग्रीमेंट की अवधि खत्‍म होने की ओर है . एडवांस में दिया गया पैसा डूबता दिख रहा है,क्‍योंकि लैंड ऑनर एग्रीमेंट में वर्णित समय का हवाला दे रहे हैं . दूसरी ओर जो गिने-चुने लोगों ने खरीदारी की,वह प्रोजेक्‍ट नहीं पूरा होने के कारण पैसे की सूद सहित वापसी मांग रहे हैं . कैश क्रंच में फंसे बिल्‍डरों की ओर से देरी होने की स्थिति में केस-मुकदमे का दौर अलग से शुरु हो गया है . आगे कभी स्थिति सुधरेगी,यह कहने की स्थिति में दौड़े-दौड़े वाराणसी गये बिल्‍डर आज बता पाने के हालात में नहीं हैं . ‍

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