शिव की ऐसी उपासना नहीं देखी, 66 साल की उम्र में भी दौड़ कर पहुंचती हैं बाबा दरबार

लाइव सिटीज डेस्क : 108 किमी का सफर 15 घंटे में. वह भी पैदल. शायद सुनकर आपको आश्चर्य लगे. लेकिन यही सच है. विश्वप्रसिद्ध श्रावणी मेले में यह सफर तय करती हैं कृष्णा बम. हर सावन की हर सोमवारी को वह गंगाधाम सुल्तानगंज से जल भर कर बाबाधाम देवघर पहुंचती हैं और भोलेनाथ पर जलाभिषेक करती हैं. कृष्णा का यह डाकबम जाने का सिलसिला पिछले 38 वर्षों से अनवरत जारी है. वह हर सावन की हर सोमवारी को देवघर में बाबा का ​जलाभिषेक करती हैं.

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जीवन के 66 वसंत पार कर चुकीं मुजफ्फरपुर की रहनेवाली शिक्षिका कृष्णा रानी कब कांवरिया पथ पर सेलिब्रेटी कृष्णा बम बन गयीं, उन्हें खुद पता नहीं चला. यह उनका 38वां सावन है, जब वह डाकबम के रूप में आज सोमवार को देवघर पहुंची. 108 किमी के इस सफर में अब तो लोग उन्हें देखने के लिए ही नहीं, बल्कि उनका आशीर्वाद लेने के लिए भी बेचैन रहते हैं. इतना ही नहीं, उन्हें सुल्तानगंज से लेकर देवघर के बीच कोई दिक्कत नहीं हो, इसके लिए पुलिस भी सुरक्षा में लगी रहती है.

कृष्णा बम जब गंगाजल लेकर सुल्तानगंज से निकलती हैं, तो जोश उनका वही 37 साल पुराना वाला रहता है. कदम बढ़ गये, तो बाबाधाम पहुंचने के पहले नो ब्रेक. भले ही कृष्णा बम 2013 में टीचर के पद से रिटायर हो गयी हैं, लेकिन वर्ष 1980 से उनका डाक बम के रूप में देवघर जाना अनवरत जारी है.

अशरफी देवी व दीनानाथ ठाकुर की बेटी कृष्णा रानी ने लाइव सिटीज को बताया कि कब मैं कृष्णा रानी से कृष्णा बम बन गयी, मुझे खुद पता नहीं. उन्होंने कहा कि वे वर्ष 1980 से हर सावन के हर सोमवार को वे डाक बम के रूप में देवघर पहुंच कर बाबा का जलाभिषेक करती हैं. वे कहती हैं कि इस सावन पांच सोमवारी पड़ा है. सो शुरुआत की दो सोमवारी वे उज्जैन चली गयी थीं. वहीं बाबा को उन्होंने जलाभिषेक किया. अब बाकी के तीन सोमवार को देवघर में जलाभिषेक करेंगी.

कृष्णा बम बताती हैं कि मैं रविवार को ही सुल्तानगंज पहुंच कर अपराह्न लगभग दो बजे उत्तर वाहिनी गंगा का जल भरती हूं और चल पड़ती हूं बाबा धाम. कब सुल्तानगंज से देवघर पहुंच जाती हूं, पता ही नहीं चलता है. पहले तो वे 12 घंटे में देवघर पहुंच जाती थी, अब 15 घंटे लग जा रहे हैं. बकौल कृष्णा बम, 1951 में उनका जन्म वैशाली के प्रतापटांड़ गांव में हुआ था. पढ़ाई के लिए पिताजी मुजफ्फरपुर लेते आये. बाद में मैं शिक्षक बन कर मुजफ्फरपुर की ही होकर रह गयी. वर्ष 2013 में रिटायर कर गयी हूं, लेकिन देवघर जाने से अभी रिटायर नहीं की हूं.

देवघर डाकबम के रूप में जाने के बारे में वह कहती हैं कि पति नंदकिशोर ठाकुर एक बार गंभीर रूप से बीमार पड़ गये थे. वे कालाजार से पीड़ित थे. उस समय कालाजार को गंभीर बीमारी माना जाता था. काफी इलाज के बाद भी जब पति ठीक नहीं हुए तो कांवर यात्रा की मैंने मन्नत मांगी. बाबा ने हमारी प्रार्थना सुन ली. तब से मैं हर सावन की हर सोमवार को डाक बम के रूप देवघर जा रही हूं. इतना ही नहीं, वे कहती हैं कि मैं साइकिल से 1900 किमी तक वैष्णोदेवी की यात्रा भी कर चुकी हूं. साथ ही हरिद्वार से बाबाधाम, गंगोत्री से रामेश्वर व कामरूप कामाख्या तक की यात्रा भी मैंने साइकिल से पूरी की हूं.

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