नहीं रहे यारपुर वाले गुरुदेव बलराम बाबा, बांस घाट पर आज अंतिम संस्कार

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लाइव सिटीज डेस्क : पटना के यारपुर स्थित मातृउद्बोधन आश्रम के संस्थापक व संरक्षक श्री श्री 1008 गुरुदेव बलराम जी महाराज नहीं रहे. दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल में बाबा बलराम ने शुक्रवार को अंतिम सांस ली. वे 85 वर्ष के थे.

बाबा का पार्थिव शरीर विमान से उनके पटना स्थित आवास पर पहुंच गया. उनका अंतिम संस्कार शनिवार को बांस घाट पर होगा. शनिवार की सुबह भी उनके अंतिम दर्शन के लिए अनुयायी उमड़ रहे हैं. दोपहर में यारपुर स्थित आश्रम से शव यात्रा निकलेगी. सूत्रों के अनुसार पहले गुलबी घाट पर अंत्येष्ठी करने की योजना थी. बाद भीड़ को देखते हुए स्थान को बदला गया.

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वे अपने पीछे पांच पुत्र, चार पुत्रियों समेत भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं. वे बलराम बाबा के नाम से फेमस थे तथा पूरी उम्र वे मानव सेवा में लगे रहे.

5 जून, 1933 को जन्म लेने वाले बलराम बाबा को 17 वर्ष की उम्र में ही गुरु एसके भट्टाचार्या का सान्निध्य मिल गया. तब से उन्होंने साधना शुरू कर दी. उन्होंने 1962 में मातृ उद्बोधन आश्रम की स्थापना की थी. तब यह आश्रम भक्तों व उनके अनुयायियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं था.

बलराम बाबा अपने जीवन में पूर्ण आध्यात्मिक सफलता के साथ 1975 में शत चंडी महायज्ञ, 1987 में सहस्त्र चंडी महायज्ञ, 1991 में लक्ष चंडी महायज्ञ 2009 में कोटि चंडी महायज्ञ का आयोजन कराया था. मानव सेवा के लिए उन्हें रुद्र अभिषेक फाउंडेशन, लंदन ने इंटरनेशनल हिंदू अवाॅर्ड और देवी धाम हॉलैंड ने मिलेनियम इंटरनेशनल हिंदू अवाॅर्ड से सम्मानित किया था. इनके शिष्यों में बड़े राजनीतिज्ञ भी रहे. पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ. जगन्नाथ मिश्र के अलावा कई बड़े नाम हैं, जो इनके शिष्य रहे हैं.

बाबा बलराम के सुपुत्र गजेंद्र सिंह ने मीडिया को बताया कि बाबा को किडनी, हार्ट आदि में इंफेक्शन हो गया था. उन्हें पहले पटना के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज कराया गया था. स्थिति नहीं सुधरने पर दिल्ली के एम्स में एडमिट कराया गया. हालांकि डॉक्टरों ने बचाने की काफी कोशिश की. लेकिन वे सफल नहीं हो सके.
गजेंद्र सिंह ने बताया कि बाबा को बचपन से ही अध्यात्म के प्रति काफी रूझान था. बाद में उनकी नौकरी बिहार बोर्ड में हो गयी. लेकिन नौकरी में उनका मन नहीं रमा और फिर अध्यात्म की शरण में आ गये. हर गुरु पूर्णिमा पर उनके दर्शन को आश्रम में लोगों की जबर्दस्त भीड़ जुटती थी.

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