फिर बताया जा रहा बिहार को, खटिया में गिरा ‘भूरा बाल’ उठ खड़ा होगा !

पटना : बिहार गंभीर सियासी संकट के दौर से गुजर रहा है. लालू प्रसाद फिर तन कर खड़े हो गये हैं. कह दिया- तेजस्वी यादव नहीं देंगे इस्तीफा. अब नीतीश कुमार क्या करेंगे, तय कर पाना बहुत मुश्किल है. बर्खास्तगी का फैसला आसान नहीं होगा. हो गया, तो लालू प्रसाद बहुत भुनायेंगे. वैसे भी, ‘भूरा बाल’ के पुराने राग को फिर से छेड़ दिया गया है. बात धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है. कहा जा रहा है कि ऐसा हुआ तो ऐसा होगा और वैसा हुआ तो वैसा हो जाएगा.

शब्द ‘भूरा बाल’ का ईजाद 1990 के दशक में हुआ था. जानकार लालू प्रसाद को क्रेडिट देते हैं. कहा जाता है कि ‘भूरा बाल साफ करो’ का संदेशा था. इस संदेशे के माध्यम से पिछड़ी जातियों की गोलबंदी हुई. सत्ता में सवर्णों का दबदबा कम हुआ. पिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी बढ़ गई. यह पोलिटिकल डर सदैव दिखाया जाता है कि लालू प्रसाद कमजोर हुए तो खटिया में गिरा ‘भूरा बाल’ फिर से उठ खड़ा हो जाएगा.

अब वर्तमान सियासी संकट को देखें. जमाना प्रवक्ताओं का है. इनके बयानों से ही आग लगती-बुझती है. इन्हें जैसा कहने को बोला जाता है, वैसा ही बोल देते हैं. बिहार की सभी पार्टियों में प्रवक्ताओं की सूची देखें, अधिक ‘भूरा बाल’ वाले मतलब भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला ही दिखेंगे. दूसरे सभी बाद की पंक्ति में दिखते हैं.

सबसे पहले राजद की चर्चा ही कर लें. नीतीश कुमार पर सबसे अधिक अटैक पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने ही किया है. बहुत चुटीले प्रहार किए हैं. रघुवंश बाबू प्रवक्ता से बड़े हैं, पर राजपूत ही हैं. सुशील कुमार मोदी जब रोज खुलासे करने लगे, तो जवाब देने को राजद को मनोज कुमार झा को दिल्ली से पटना लैंड कराना पड़ा. वे दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. प्रजाति भले ‘भूरा बाल’ की कैटेगरी की हो, लालू प्रसाद को पता है कि मौजूदा समय में मनोज कुमार झा से बेहतर और कोई विकल्प उनके पास नहीं है. चैनलों पर राजद के लिए खूब तेज बोलने वाले तिवारी जी मतलब मृत्युंजय तिवारी हैं. इधर के दिनों में राजद की आधिकारिक राय जाहिर करने को पूर्व मंत्री जगदानंद आगे आ रहे हैं. सबों को पता है कि राजपूत हैं.

जदयू की लिस्ट भी कुछ ऐसी ही है. अभी सबसे आधिकारिक बयान नेशनल जेनरल सेक्रेटरी केसी त्यागी का माना जाता है. अधिक दिल्ली से ही बोलते हैं. बिहार के नहीं हैं, पर इनकी जाति सभी जानते हैं. बिहार में जदयू के प्रवक्ता विधान पार्षद संजय सिंह के बारे में बताने की जरूरत नहीं, राजपूत हैं. दूसरे धारदार प्रवक्ता एमएलसी नीरज कुमार मोकामा के भूमिहार हैं. अजय आलोक और राजीव रंजन प्रसाद पटना के ही कायस्थ मतलब लाला हैं. जदयू की स्टेट कमेटी की बैठक के बाद सबसे पहला बयान संजय कुमार झा ने ही दिया.

भाजपा में तुरंत जवाब देने को मीडिया को सबसे पहले एमएलसी विनोद नारायण झा मिलते हैं. प्रवक्ता के तौर पर सबसे अधिक बाइट इनकी ही चलती है. जान ही रहे हैं कि झा जी हैं और मधुबनी के हैं, तो दूसरे हो नहीं सकते हैं. मतलब साफ है कि समय के हिसाब से ‘भूरा बाल’ की पॉलिटिक्स जरूर कमजोर और मजबूत होगी, लेकिन सभी प्रमुख पार्टियों के प्रवक्ता इसी जमात से आएंगे.

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