बड़ा खुलासाः व्हाट्सएप्प पर लड़की से न्यूड फोटो मांगता था रेपिस्ट बाबा जैन मुनि

लाइव सिटीज डेस्कः जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे हकीकत सामने आ रही है. रेप केस में फंसे जैन मुनि की एक और सच्चाई का खुलासा हुआ है. अब रेप के आरोप लगाने वाली लड़की खुद सामने आ चुकी है. उसके मुताबिक, ब्रह्मचर्य का दावा करने वाले जैन मुनि शांतिसागर ने सुख-शांति के पाठ के बहाने उससे उसकी न्यूड फोटो व्हाट्सएप्प पर मंगवाई थी.

विक्टिम ने लीगल काउंसलर, गाइनेकोलॉजिस्ट और साइकोलॉजिस्ट के जरिए मीडिया से यह बातें बताई. विक्टिम ने बताया कि मां-बाप के सुख और कामयाबी जैसी बातों को लेकर शांतिसागर ने उसे डराया और जबरन फिजिकल रिलेशन बनाने पर मजबूर किया. 19 साल की विक्टिम के मुताबिक 31 मार्च को मांडवी में पहली बार वो परिवार के साथ आचार्य शांतिसागर से मिली.

पीड़िता ने बताया कि प्रवचन से हम सब मंत्रमुग्ध हो गए. लड़की ने शिष्य बनाने का आग्रह किया. फिर जैन मुनि ने धार्मिक शिक्षा शुरू की. धीरे-धीरे शांतिसागर मुझे एसएमएस और वॉट्सऐप करने लगे. सुख और कामयाबी के लिए जप करने को कहा. बीच-बीच में फोन भी करते.

लड़की ने बताया कि दो महीने पहले शांतिसागर ने फोन कर कहा कि तुम्हारी सुख-शांति के लिए जाप करना है. अपनी फोटो मुझे भेजो. उनके कहे मुताबिक मैंने फोटोज व्हाट्सएप्प कर दिए. दोबारा फोन कर उन्होंने कहा कि मुझे दोस्त समझना. तुम अपनी एक न्यूड फोटो भेजो. विधि में इसकी भी जरूरत है.

लड़की ने अपने बयान में आगे कहा है कि फोटो मिलने के बाद शांतिसागर बार-बार मैसेज करने लगे. जब चातुर्मास के लिए सूरत आए, तो हम सबको भी बुला लिया. तब तक किए विधि-जाप की दक्षिणा के तौर पर मुझसे डांस करवाया. उसके बाद जबरन  शारिरिक संबंध बनाया.

जानिए शांतिसागर के बारे में

शांतिसागर का बचपन से लेकर जवानी तक का एमपी के गुना डिस्ट्रिक्ट में ताऊजी के साथ रहे. उनके एक दोस्त ने बताया कि पहले उनका नाम गिरराज शर्मा था. उनका परिवार कोटा में रहता था. पिता सज्जनलाल शर्मा वहीं पर हलवाई थे. दोस्त ने बताया कि गिरराज मौज-मस्ती में जीने वाला था. खूब क्रिकेट खेलता था. पढ़ाई में एवरेज था.

उनके दोस्तों का ग्रुप शहर में उन दिनों के सबसे फैशनेबल युवाओं का था. कपड़े हों या हेयर कट, नए ट्रेंड को सबसे पहले यही ग्रुप अपनाता था. गिरराज 22 साल की उम्र में मंदसौर में जैन संतों के कॉन्टेक्ट में आए. पढ़ाई अधूरी छोड़कर वहीं दीक्षा लेकर गिरराज से शांतिसागर महाराज बन गए. संन्यासी बनने के तीन दिन पहले वह गुना आए थे. दो दिन बिताने के बाद कभी गुना नहीं लौटे.