मिसाल-बेमिसाल: ये IG अंकल ‘डंडे’ ही नहीं ‘चॉक’ चलाने में भी मास्टर,बना रहे हैं बच्चों का भविष्य

अभयानंद का फाइल फोटो

लाइव सिटीज डेस्क : The Cop with a Chalk… यह केवल डॉक्यूड्रामा नहीं है और न ही कोई पुलिस अधिकारी की सफलता की गाथा है. न ही यह एक सफल पिता और पुलिस में टॉप पर पहुंचे अफसर की कहानी है. यह वैसे आईजी अंकल का जीवंत उदाहरण है, जिन्होंने समाज में एक मिसाल पेश की है और वे इसमें लगातार लगे हुए भी हैं. इसके लिए उन्होंने कभी भी टाइम की कमी का रोना नहीं रोया. जब वे पुलिस में सीनियर अफसर थे तब भी उन्होंने बच्चों को शिक्षा देने के लिए समय निकाला. और, रिटायर करने के बाद तो और अधिक मेहनती हो गये हैं. यूं कहें कि अभयानंद ने पुलिस के डंडा के साथ ही चॉक को भी उसी अंदाज से चलाया.

पढ़ाने का जुनून हो, कुछ अलग करने का जुनून हो तो समय की कमी का हम बहाना नहीं कर सकते हैं. इसी सिद्धांत का फीजिक्स के स्टूडेंट रहे आईजी अभयानंद ने अपने करियर में पालन किया. यही वजह रही कि वे कम्यूनिटी पुलिसिंग के साथ ही एजुकेशन में भी पूरी तन्मयता के साथ जुड़ गये. पुलिस में तो उन्हें पॉपुलरिटी मिली ही, एजुकेशन में भी वे ‘आईजी अंकल’ बन गये. अब तो वे राज्य की सीमा से ऊपर उठ गये हैं. बिहार से शुरू हुआ सुपर-30 अन्य राज्यों में भी छा गया है. पूरे देश में उनकी डिमांड हो रही है. पिछले दिनों उन्हें राजस्थान के जयपुर में सम्मानित किया गया था.



आईजी अंकल के नाम से मशहूर बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद के जुनून में बच्चों को पढ़ाना शामिल हो गया है. वे आईआईटी की फ्री तैयारी कराते हैं. लेकिन फ्लैश बैक जाते हैं तो पाते हैं कि उन्होंने इसकी शुरुआत 14 साल पहले की. उस समय उनका ट्रांसफर बीएमपी में हो गया था. अभयानंद की मानें तो बीएमपी में ट्रांसफर उस समय पुलिस डिपार्टमेंट में काफी शंट माना जाता था. लेकिन, उन्होंने इसमें भी क्रिएटिव करने का निर्णय लिया. चूंकि बीएमपी में व्यस्तता कम रहती है, इस वजह से उन्होंने अपने बेटे को पढ़ाने में समय देना शुरू किया. उनकी मेहनत ने रंग लायी और बेटे ने आईआईटी क्रैक कर लिया. यहीं से उनकी सोच ने टर्न लिया.

अभयानदं के अनुसार, मेरे दिमाग में बात आयी कि जब मैं अपने बेटे को पढ़ा कर उसे आईआईटी भेज सकता हूं तो अन्य बच्चों को क्यों नहीं. बस यहीं से सुपर-30 की शुरुआत हुई. उन्होंने पुलिसिंग की बिजी शिड्यूल से समय निकाल कर आनंद कुमार के सुपर-30 में फिजिक्स पढ़ाना शुरू किया. बच्चों ने उन्हें ‘आईजी अंकल’ का नाम दिया. एडीजी से लेकर डीजीपी तक पहुंचने के बाद भी वे बच्चों के लिए आज भी ‘आईजी अंकल’ ही बने हुए हैं.

 

बाद में अभयानंद में रहमानी सुपर-30 बनायी. उनकी मेहनत व लगन से रहमानी सुपर 30 को जबर्दस्त सफलता मिल रही है. हर साल रहमानी के बच्चे आईआईटी को क्रैक कर रहे हैं. रिटायर होने के बाद तो वे और अधिक मेहनती हो गये हैं. वे कहते भी हैं कि बच्चों का रिजल्ट आता है तो लगता है कि यह मेरा रिजल्ट है. रिटायर करने के बाद तो मेरे पास समय ही समय है. अब मेरा पूरा फोकस पढ़ाने पर है. बच्चे तो अब उनके मोबाइल नंबर पर भी उनसे बेझिझक सवाल पूछ लेते हैं और वे भी हंसते हंसते जवाब दे देते हैं. बता दें कि रहमानी सुपर 30 बिहार के लगभग जिलों में चल रहे हैं और वे स्टूडेंट्स के साथ ही वहां के टीचरों की भी मॉनिटरिंग करते हैं.

एजुकेशन ही नहीं, अभयानंद की पुलिसिंग भी काफी चैलेंजिंग रही है. बात तब की है जब वे बिहार में औरंगाबाद के पुलिस कप्तान थे. उस समय उनके नेतृत्व में मुट्ठी भर पुलिसकर्मियों ने नक्सल गिरोह को जिले से खदेड़ दिया. उनके कामकाज के तरीकों को बिहार के दूसरे जिले ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों ने भी अपनाया. देश के अन्य राज्यों ने एक समान मॉड्यूल का पालन करना शुरू किया.

इतना ही नहीं, अभयानंद समाज सेवा के क्षेत्र में भी मिसाल बने हुए हैं. भले ही बिहार में वर्ष 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू हुआ है और अब देश भर में यह चल रहा है. लेकिन इस मामले में भी अभयानंद की कोई सानी नहीं. वे लड़कियों की शिक्षा को काफी पहले से प्रोत्साहित कर रहे हैं. सबसे पहले उन्होंने लड़कियों की शिक्षा को अपनी ही पुलिसिंग में लागू किया. उन्होंने कॉन्स्टेबलों की लड़कियों के लिए बिहार सैन्य पुलिस कैंपस में स्कूल खोला था. यह बात 1994 की है. उस समय वे डीआईजी थे. गर्ल्स एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इस स्कूल में लड़कियों का एडमिशन ही नहीं मंथली भी फ्री कर दिया.

आज गर्व की बात है कि अभयानंद पर डॉक्यूड्रामा बन रहा है. यह फिल्म नये साल में फरवरी में आ रही है. इसमें भी उनकी सफलता की कहानी कही गयी है. वे किस तरह पुलिसिंग के साथ ही एजुकेशन में भी छा गये, फिल्म में इसकी गाथा है. वे पुलिसिंग में डंडा चलाने में जितने एक्सपर्ट रहे, उतने ही महारत उन्हें चॉक चलाने में भी है.