गरीबों के लिए स्कूल नहीं, अमीरों के लिए मैक्स-मेदांता, वकील भी महंगे, फिर कैसा एक राष्ट्र ?

पटना : देश में GST मतलब ‘एक राष्ट्र, एक कर’ आज शनिवार 1 जुलाई से लागू हो चुका है. भाजपा इसे देश की सबसे बड़ी आर्थिक क्रांति कह रही है. कांग्रेस बिना तैयारी महंगे टैक्स का आरोप लगा रही है. इस बीच जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के संरक्षक और मधेपुरा सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बड़ा सवाल पूछ दिया है.

श्री यादव ने कहा कि पूंजीपति व्यवस्था को GST मुबारक हो, पर सरकार यह बताये कि देश की व्यवस्था एक समान कैसे हो गई. टैक्स देश के नागरिकों को बराबरी का अधिकार कैसे दिला सकता है. अब तो GST में करोड़पति-खाकपति बराबर का टैक्स देंगे, तो फिर इस व्यवस्था से समाज के अंतिम व्यक्ति को कौन-सा फायदा मिलेगा.

उन्होंने कहा कि देश जानना चाहता है कि GST की तरह भारत के नागरिकों को एक शिक्षा, एक हेल्थ और एक न्याय की सुविधा कब मिलेगी. सरकार टैक्स बराबरी से ले और सुविधा अलग-अलग हो, इससे बड़ी गुलाम व्यवस्था आम आदमी के लिए और कुछ भी नहीं है. क्या देश का असली सच ये नहीं है कि गरीबों के बच्चों के लिए पढ़ने को स्कूल नहीं है. सरकारी स्कूल है भी तो पढ़ाई नहीं है. तो फिर ये बच्चे और अभिवावक कैसे मान लें कि देश और देश के लोग एक हैं. इनके पास निजी स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने को पैसे तो हैं नहीं. फिर, वे 10 से 20 लाख रुपये की सालाना फीस देकर बोर्डिंग स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चों के समान कैसे हो गए. सरकार देश का भला तब तक नहीं कर सकती, जब तक कॉमन एजुकेशन की व्यवस्था बहाल न हो.

पप्पू ने कहा कि हेल्थ सेक्टर की दुर्दशा को ठीक किये बिना देश एक कैसे हो सकता. गांव में लोग खांसी-बुखार/कै-दस्त में आज भी मर जा रहे हैं. पर दूसरी ओर अमीरों की असाध्य बीमारी भी मैक्स-मेदांता जैसे फाइव स्टार अस्पतालों में जीने की उम्र बढ़ा रही है. गरीब के पास बड़ी बीमारी में भी अस्पताल जाने और खर्च उठाने की क्षमता नहीं होती, दूसरी ओर बड़ों का किसी अन्य कारण भी सिर चकरा गया तो बड़े अस्पतालों में जाकर लाखों फूंक आते हैं. आखिर, यह कैसी बराबरी और एक राष्ट्र है?

देश के जस्टिस सिस्टम की बात करते हुए पप्पू यादव ने कहा कि कोई हमें बताए कि वह दिन कब आएगा, जब लाखों-करोड़ों में फीस लेने वाले राम जेठमलानी और मुकुल रोहतगी जैसे वकील एक राष्ट्र में सभी के लिए उपलब्ध होंगे. एक राष्ट्र, एक लोग की बात तब तक बेमानी है, जब तक निरपराध गरीब वकील न रख पाने के कारण मुकदमा हारता हो और सजा काटता हो, वहीं दूसरी ओर देश के बड़े डकैत महंगे कानूनी धुरंधरों के बूते सभी तरह के जुर्म से मुक्त हो जाते हों.

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