Exclusive : सेशन शुरू हुए 3 महीने हो गए, अब छपेगी किताब, किसे देंगे सरकार?

पटना : आज 3 जुलाई को पटना से प्रकाशित अखबार ‘हिन्दुस्तान’ के पांचवें पन्ने को देखिएगा. बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कारपोरेशन लिमिटेड का प्रकाशित बड़ा-सा टेंडर विज्ञापन देखिए. यह टेंडर टेक्स्ट-बुक की छपाई के बाबत है. अब इसे आप पढ़ना शुरू कर दें. सारा खेल खुद-ब-खुद समझ जाएंगे. बिहार के बच्चों के साथ सरकार कैसे खेलती है, यह टेंडर विज्ञापन बानगी है. लेकिन सच यह भी है कि न खेले तो 150 करोड़ रुपये के घपले की बुनियाद पड़े भी तो कैसे?

लाइव सिटीज सिर्फ टेंडर विज्ञापन के तथ्यों से छुपे सभी सीक्रेट को बताने की कोशिश कर रहा है. बिहार बोर्ड में पहले 12 वीं और बाद में मैट्रिक की परीक्षाओं के नतीजे खराब आये, तो कितना हंगामा बरपा. जरूरी भी था. पर, टेक्स्ट बुक का यह टेंडर विज्ञापन बता रहा है कि बच्चों के साथ खेल तो बिहार सरकार ही शुरू करती है. शिक्षा की बुनियाद स्कूलों में पहली कक्षा से आठवीं कक्षा की पढ़ाई होती है. आगे की पढ़ाई में बुनियाद के श्रेष्ठ-मध्यम-खराब लक्षण दिखते हैं.

 

बिहार की व्यवस्था में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को क्लास-1 से क्लास-8 तक की टेक्स्ट बुक फ्री में देने का नियम है. यह व्यवस्था सर्व शिक्षा अभियान के तहत की गई है. नियम तो छात्रों के हित मे ठीक ही बना, पर घपला सिस्टम इसे पंक्चर करता है. अब फिर से टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कारपोरेशन के टेंडर को पढ़ते हैं. यह टेंडर एकेडमिक ईयर 2017-18 के टेक्स्ट-बुक की छपाई के लिए है. गौर करिए, क्योंकि घपले की बुनियाद यही है. सभी जानते हैं कि बिहार के स्कूलों में एकेडमिक ईयर की शुरुआत अप्रैल महीने में हो जाती है.

मतलब साफ है एकेडमिक ईयर 2017-18 का प्रारंभ 1 अप्रैल,2017 को हो चुका है. इसका अर्थ यह भी बहुत स्पष्ट है कि सेशन शुरू हुए 3 महीने से अधिक हो गए, लेकिन अब तक किसी भी बच्चे को टेक्स्ट-बुक नहीं प्राप्त हुए हैं. ग्राउंड जीरो से मिल रही रिपोर्ट लाइव सिटीज की टीम को बता रही है कि बिना किताब स्कूलों के बच्चों में हाहाकार है. थोड़ा और एनालाइज कर लें, तो मतलब यह कि जिन पैरेंट्स के पास कुछ पैसे होंगे, वे मार्केट से प्राइवेट पब्लिशर्स की पुस्तकें खरीद चुके हैं और जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे भगवान भरोसे स्कूलों में हैं.

एक बार फिर छपे टेंडर पर गौर फरमाते हैं. सबसे अधिक संख्या में जिस पुस्तक की छपाई होनी है, वह टोटल में 2 करोड़ 12 लाख 74 हजार है. खर्च 43 करोड़ 10 लाख 29 हजार 500 रुपये बताया गया है. दूसरे बड़े नंबर का टोटल 1 करोड़ 57 लाख 83 हजार है, इस पर खर्च 37 करोड़ 79 लाख 26 हजार 500 रुपये निर्धारित है. इस तरह से कुल 8 पैकेज नंबर के टेक्स्ट बुक की छपाई का यह टेंडर कोई 150 करोड़ रुपयों का है.

अब आपको टेंडर शेड्यूल और प्रोग्राम की जानकारी दे देते हैं, जो स्पष्ट करेगा कि 150 करोड़ रुपयों का खर्च कर सरकार टेक्स्ट-बुक भले छपवा ले, पर बच्चों को यह हाफ-इयरली एग्जाम के बाद भी नसीब नहीं होगा. तब तक, बच्चे निराश हो चुके होंगे और यहां घपले का खेल चलता रहेगा. टेंडर विज्ञापन कहता है कि टेक्स्ट-बुक छापने को इच्छुक प्रिंटर्स 4 जुलाई से 24 जुलाई के दोपहर 1.30 बजे तक टेंडर डाक्यूमेंट्स खरीद सकते हैं. प्री-बिड मीटिंग 10 जुलाई को होगी. 26 जुलाई तक EMD की हार्ड कॉपी सब्मिट करनी होगी. टेक्निकल-बिड 26 जुलाई को ही शाम 4 बजे खोला जाएगा. फाइनेंसियल-बिड की ओपनिंग की तारीख बाद में तय होगी. अब बहुत जल्दी मान भी लें, तो 31 जुलाई तक फाइनेंसियल-बिड की ओपनिंग होती है. यह हो भी गया, तो मतलब बिना किताब स्कूल जाते बच्चों के 4 महीने गुजर चुके होंगे.

कुल 150 करोड़ रुपयों से कोई 5 करोड़ पुस्तकों की छपाई का कार्य घर की रसोई में DBC (दाल-भात-चोखा) बना देने का कार्य नहीं होता है. कागज सहित छपाई, बाइंडिंग, पैकिंग और आगे ब्लॉक स्तर तक इन्हें पहुंचाना सिर्फ बड़ा नहीं बहुत बड़ा काम होता है. कई-कई महीने लगेंगे. तीन महीने से छह महीने भी लग सकते हैं, प्रिंटिंग एक्सपर्ट बताते हैं.

जानकार कहते हैं कि अभी तो पिछले साल के टेंडर की छपी सभी किताबें ही नहीं पहुंची है. मतलब साफ है कि सरकार ने सभी नट-बोल्ट टाइट भी कर दिए, तो बच्चों को 12 महीनों के एकेडमिक ईयर में सरकार की किताब सातवें-आठवें महीने के बाद मिलनी शुरु होगी. यह देरी भी घपले को अंजाम देने का बना-बनाया सिस्टम है. खैर, बात बड़े कैनवास में और सवाल यह कि 12 महीनों के सेशन में बच्चों के पास जब 8 से 10 महीने तक कोई किताब ही नहीं होगी तो वे पढ़ेंगे क्या खाक. और, फिर ऐसे में किसी बेहतर रिजल्ट की आस और व्यवस्था में सुधार की हर कवायद बेमानी नहीं तो और क्या कही जाएगी.

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