बेमिसाल : ‘क्वालिटी कार्नर’ की वसीयत, कमाई का 30% हिस्सा स्टाफ के नाम

पटना (नियाज़ आलम) : अपनी गुणवत्ता के लिए मशहूर बोरिंग रोड चौराहा स्थित मिठाई की दुकान क्वालिटी कार्नर इन दिनों दुकान मालिक सरदार महेन्द्र सिंह की वसीयत के कारण चर्चा में है. विगत 3 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में सरदार महेन्द्र सिंह का दुखद निधन हो गया. इसके बाद उनकी बड़ी बेटी कंवलजीत कौर ने उनकी वसीयत दुकान के सभी कर्मचारियों को बताई. वसीयत के मुताबिक दुकान की कमाई का 30 प्रतिशत हिस्सा उसके सहयोगियों यानि कर्मचारियों को मिलेगा. ये हिस्सा उनके वेतन के अलावा होगा, जो अगले माह से मिलना शुरु हो जाएगा. इसके अलावा 20 प्रतिशत व्यवसाय के विस्तार के लिए खर्चा जाएगा, 10-10 प्रतिशत व्यवसाय की देखरेख और कल्याण कोष के लिए है. बाकी का 30 प्रतिशत परिवार के हिस्से में आएगा. 

दुकान से लगभग 50 परिवारों की आजीविका चल रह रही है. दुकान से लगभग एक लाख रुपए प्रतिमाह मुनाफा आता है. कंवलजीत कौर ने बताया कि पिछले लगभग 10 साल से उनके पिता इस बात पर विचार कर रहे थे  कि उनके बाद भी उनके परिवार जैसे कर्मचारियों को दुकान से लाभ मिलता रहे. उन्होंने कहा कि पिता के फैसले में पूरा परिवार साथ है. हम लोगों को खुशी है कि हमारे पिता ने इतना बेहतरीन और सामाजिक संदेश देने वाला फैसला लिया. 

कंवलजीत ने बताया कि उनके पिता शुरु से ही काफी जुझारू रहे. 1947 में बंटवारे के समय लाहौर, पाकिस्तान से 22 वर्ष की आयु में परिवार के साथ पटना आ गए. पहले पटना जंक्शन पर प्रभात होटल शुरू किया. 1952 में सड़क चौड़ीकरण के कारण प्रभात होटल बंद करना पड़ा, उसके बाद परिवार ने न्यू मार्केट के पास पंजाब किराना स्टोर नाम से दुकान खोली. कंवलजीत के मुताबिक उनके पिता शिक्षा को लेकर काफी संवेदनशील थे  और उससे किसी भी तरह से समझौता नहीं करना चाहते थे . परिवार में शिक्षा पर विशेष जोर नहीं होने के कारण उनके पिता ने बोरिंग रोड चौराहे पर 1960 में चाय व टोस्ट की दुकान से क्वालिटी कार्नर की नींव रखी. बाद में यह शहर की मशहूर मिठाई दुकान में तब्दील हो गई. 

सरदार महेन्द्र सिंह का कहना था कि दुकान के किसी भी सामान की गुणवत्ता से समझौता नहीं करना है. जो सामान हम खुद नहीं खा सकते वह ग्राहक को नहीं देना. 1960 में क्वालिटी कार्नर खुलने के बाद 1962 से दुकान से जुड़े सीतामढ़ी के राजेन्द्र राय ने कहा कि दूध की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सरदार महेन्द्र सिंह ने अपनी डेयरी ही खोल ली थी.

राजेन्द्र राय अपने पुराने मालिक की खूबियां गिनाते नहीं थक रहे. यही हाल 1978 से उनके साथ रह रहे मेघनाद भगत का भी है. वर्तमान में दुकान के इंचार्ज राजीव कुमार झा तो यहां 1977 में मात्र 10 साल की उम्र में ही आए थे. यहां और भी कई ऐसे कर्मचारी हैं जो 40-50 साल से यहां काम कर रहे हैं. सभी कर्मचारियों का यही कहना है कि बाबू जी (सरदार महेंद्र सिंह) का कर्मचारियों को लेकर व्यवहार एक परिवार के अभिभावक की तरह था. उनसे मिलने के बाद उन्हें छोड़ कर कहीं और नौकरी करने का विचार कभी आया ही नहीं. 

राजेन्द्र राय कहते हैं कि सरदार जी ने उन्हें पुत्र के समान प्यार दिया. उनके बच्चों की पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था कराई. इतना ही नहीं, अपने कर्मचारियों को भी उन्होंने पढ़ाया और इसके लिए बकायदा शिक्षक भी रखा. काम के बाद सभी कर्मचारी पढ़ाई करते थे. बता दें कि सरदार महेन्द्र सिंह के तीन बेटे और चार बेटियां हैं. उन्होंने सभी को ऊंची शिक्षा दिलाई.

दो बेटे लुधियाना में हैं. कोई व्यापार तो कोई ऊंची नौकरी में हैं. परिवार के बच्चों ने भी ऊंची शिक्षा हासिल कर अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर मुकाम हासिल किया है. कई कर्मचारियों के बच्चे भी आज पढ़ लिखकर अच्छी जगह नौकरी कर रहे है.

अखबार में खबर पढ़कर की मदद
सरदार महेन्द्र सिंह से किसी का दुख नहीं देखा जाता था. उनकी बेटी कंवलजीत कौर ने बताया कि कुछ साल पहले उनके पिता ने एक अखबार में पढ़ा कि मोतीहारी के किसी बिजली कर्मी ने काम के दौरान दुर्घटनाग्रस्त होकर अपना एक हाथ गंवा दिया है. वह पीएमसीएच में भर्ती है और इलाज के लिए उसकी पत्नी भीख  मांगने को मजबूर है.

इस खबर से सरदार जी इतने आहत हुए कि उन्होंने अपने स्टाफ राजेन्द्र राय को पीएमसीएच भेजकर उस बिजलीकर्मी की पत्नी की मदद की और उसका पूरा इलाज करवाया. कंवलजीत के मुताबिक वह बिजली कर्मी आज भी सरदार जी सेमिलने आता है. इसके अलावा एक कर्मचारी योगी राय के पुत्र की किडनी फेल हो गई. इसकी सूचना सरदार जी को मिली तो वे रात भर सो न सके. अगले दिन ही उन्होंने मरीज को राजे  न्द्र राय के साथ दिल्ली के एम्स भेज कर इलाज करवाया.

75 के बाढ और 84 के दंगे में बर्बाद हो गई थी दुकान
कंवलजीकत कौर बताती हैं कि क्वालिटी कार्नर दो बार शून्य होने के बाद फिर से शिखर पर पहुंचा है. उन्होंने कहा कि 1975 में जब पटना में बाढ़ आई थी तो उनकी दुकान पूरी तरह तबाह हो गई ती. इस समय भी उनके पिता ने अपनी चिंता छोड़कर अपने पास रखा सारा सामान लोगों को बंटवाया. वह नाव लेकर घर घर जाकर सामान देकर आते थे. इसके बाद पिर से संभली दुकान 1984 के सिख विरोधी दंगे में दंगाइयों की बंट चढ़ गई. पूरी दुकान लूट ली गई. 

राजेन्द्र राय कहते हैं कि उस समय दुकान में सौ से ज्यादा कर्मचारी थे. सभी दंगाइयों का विरोध करने के लिए तैयार ते लेकिन सरदार जी ने इसकी अनुमति नहीं दी. सरदार महेन्द्र सिंह ने कहा ता कि सामान तदो पिर से आ जाएगा लेकिन किसी कर्मचारी की जान का नुकसान हो गया तो उसकी भरपाई नहीं हो सकती.

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