#BrandBihar : …हां मैं एक स्त्री हूं!

लाइव सिटीज डेस्क : ‘तुम तय करते हो कि हमारा रूप क्या हो, हमारा चरित्र हमारा स्वरूप क्या हो, हमारी सोच हमारी देह क्या हो, फिर भी तुम्हारी सोच पर हमें संदेह क्या हो, खड़ा कराया पोस्टरों पर जैसे, वैसे अधनंगी मैं खड़ी हूं, हां मैं एक स्त्री हूं…’ यह पंक्ति पुरुष समाज पर करारा प्रहार है. कुछ हद तक हकीकत भी है. इन दिनों यह पंक्ति सोशल मीडिया में वायरल हो रही है. इसे फेसबुक पर भी पोस्ट किया गया है, जहां ​कवयित्री व लेखिका को ढेर सारी लाइक्स व कमेंट्स भी मिले हैं. आइए बताते हैं इस ब्रांड बिहार के बारे में…

अपनी कविता से पुरुष समाज पर प्रहार करनेवाली और स्त्री समाज की पीड़ा बताने वाली यह महिला शख्सियत कोई और नहीं, बल्कि पटना की विजया सिंह है. बिहार के पटना में मीडिया से ही अपना कॅरियर शुरू करनेवाली विजया फिलहाल महाराष्ट्र के वर्धा में रह रही हैं. वहां उनका शोध कार्य चल रहा है. वे अब तक 100 से अधिक कविताएं व 25 से अधिक कहानियां लिखी हैं और यह सिलसिला अनवरत जारी है. इतना ही नहीं, ‘यौन हिंसा और समाचार पत्र’ के बाद अब उनकी नयी शोध बुक भी आनेवाली है. इसके अलावा वे सोशल मीडिया पर चल रही युवाओं की भाषा पर पीएचडी भी कर रही हैं.

लाइव सिटीज से खास बातचीत में विजया सिंह कहती हैं कि कहानियों में अनछुए फूल खासी चर्चित रही है. इसके अलावा आवाज समेत अन्य कहानियां भी साहित्यकारों के बीच इन्हें अच्छी पहचान दिलायी. इसी तरह कहानियों में शहद रानी ने जीवतंता की मिसाल कायम की. यह कहानी मुजफ्फरपुर की महिला पर लिखी गयी थीं, जिन्होंने शहद के माध्यम से समाज में एक ‘मिठास’ देने का काम किया.

पटना की युवा लेखिका विजया सिंह.

विजया कहती हैं कि उनकी कई कविताएं तो लोगों के बीच विशेष पहचान बना दी है. वह कॉलेज में कविता वाली लड़की के रूप में भी फेमस हो गयी थीं. उनकी 100 से अधिक कविताओं में सबसे ज्यादा फेमस ‘उदास शाम’ रही. इसके लिए कॉलेज में उन्हें अवॉर्ड भी दिया गया था. कविता में पहली बार अवार्ड पाकर लिखने को लेकर उनका हौसला बढ़ता चला गया. उन्हें आज भी अपनी उदास शाम की पंक्ति याद है – ‘शाम रंगीन पर उदास थी, खोया नहीं कुछ फिर भी तलाश थी…’ वे कहती हैं कि पहले वे छायावादी कविता लिखती थीं, लेकिन उनकी लेखनी यथार्थवादी कविताओं पर चल रही है. इसी के साथ वे शोध पत्र भी लिख रही हैं, जो पत्र-पत्रिकाओं में टाइम टू टाइम छपती भी हैं.

यौन हिंसा और समाचार पत्र का पिछले दिसंबर में हुआा विमोचन.

वर्धा में नये रिसर्च में जुटी विजया की मानें तो उनकी हाल में आयी शोध पुस्तक ‘यौन हिंसा और समाचार पत्र’ ने दिल्ली की मीडिया में हलचल मचा दी है. बुक में यह बताया गया है कि यौनशोषण को देश भर के समाचार पत्र न्यूज को किस प्रकार लेते हैं. किस तरह छेड़खानी और दुष्कर्म की खबरों से मीडिया वाले खेलते हैं.

फ्रंट पेज से लेकर पेज 3 तक के लेआउट पर इस तरह के न्यूजों को परोसा जाता है. वे ये नहीं समझते हैं कि पीड़िताओं की मनोस्थिति पर क्या बीतती है, उनके परिवारवालों पर कैसा कुठाराघात होता है. विजया ने अपनी पुस्तक में इसका बड़ी गंभीरता से सटीक विश्लेषण किया है.

वे बताती हैं कि दिल्ली में निर्भया कांड ने पूरे देश के साथ ही उन्हें भी सोचने के लिए विवश कर दिया था. इसी के बाद उन्होंने शोध पुस्तक लिखने का मन बनाया और आज आपके सामने है. उन्होंने कहा कि जल्द ही मेरी दूसरी पुस्तक आनेवाली है. एडिट का काम पूरा हो गया है. वे थोड़ा फ्लैश बैक में जाते हुए कहा कि मुझे बचपन से ही लिखने का शौक रहा है.

अपने शोध पुस्तक को लेकर बात करती हुई लेखिका.

समाज की ओर से प्रोत्साहित किये जाने के बाबत वे कहती हैं कि कॉलेज टाइम में ही पहली बार जब अवार्ड मिला तो उनका मनोबल लेखन के प्रति बढ़ा. बकौल विजया, इसके बाद प्रतियोगिता दर्पण की ओर से मुझे लेखन के लिए पुरस्कार दिया गया. खास बात कि मुझे वर्धा में एम-फिल करने के दौरान ‘रेप केस और मीडिया’ पर काम करने के लिए ​वर्ष 2014 में गोल्ड मेडल से नवाजा गया. क्लास वन से लेकर एम-फिल तक थ्रू आउट फर्स्ट डिवीजन आनेवाली विजया कहती हैं कि सिंगिंग और डांसिंग की ओर भी मेरा झुकाव रहा.

परिवार वालों का कितना साथ मिला, पर वे कहती है कि परिवारवालों का पूरा सहयोग मिला. पापा और मां ने मुझे कदम-कदम पर साथ दिया. खास कर पापा ने बचपन से ही कुछ बनने का सपना दिखाया था. गृहस्थ लाइफ को कैसे मैनेज करने के सवाल पर कहती हैं, ससुरालवालों ने भी पढ़ाई को लेकर मनोबल बढ़ाया. इतना ही नहीं, कामकाज से भी हमें ससुरालवालों ने नहीं रोका. हालांकि कुछ पारिवारिक जिम्मेवारियों की वजह से मीडिया में नौकरी करने के दौरान देर रात में घर लौटने पर डांट जरूर सुननी पड़ती थी.

लड़की होने का दंश भी मुझे झेलना पड़ा. घर से भी बार बार हिदायत दी जाती थी. डांट के डर से स्कूल टाइम में शाम की कोचिंग, तो जॉब टाइम में ड्यूटी को बीच में ही छोड़ कर घर लौट जाना पड़ता था. इन सब से कभी-कभी गुस्से में लगता था कि काश मैं भी लड़का होता, तो घूमने-फिरने की आजादी रहती.

वे कहती हैं कि लड़का-लड़की को लेकर व्याप्त दकियानूसी सोच से समाज को थोड़ा बाहर निकलना होगा.