बिहार में कैबिनेट विस्तार पर लग गया खरमास का ग्रहण ! अब अगले साल का करना होगा इंतजार

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : बिहार में कैबिनेट विस्तार को लेकर लगातार पेंच फंसता जा रहा है. सियासी एक्सपर्ट जितना दिमाग लगा रहे हैं, उतना ही मामला उलझता नजर आ रहा है. अब इस पर खरमास का ग्रहण लगता नजर आ रहा है. खरमास 15 दिसंबर से शुरू होने जा रहा है, आज 11 दिसंबर हो गया. खरमास 14 जनवरी तक रहेगा. इसके बाद फिर से शुभ कामों की शुरुआत होगी. ऐसे में सियासी पंडितों की मानें तो अब खरमास के बाद ही कैबिनेट का विस्तार हो सकता है. यानी नए साल में ही अब इस पर फैसला हो सकता है. इसके साथ ही राज्यपाल कोटे से विधान परिषद के सदस्यों का मनोनयन भी अटका हुआ है. चर्चा है कि अब दोनों काम खरमास के बाद ही होंगे. सियासी चर्चे के अनुसार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव की तर्ज पर कैबिनेट का विस्तार करना चाहते हैं. मतलब दोनों दलों की भागीदारी आधी-आधी सीटों पर. लोकसभा चुनाव में इसी तर्ज पर टिकटों का बंटवारा हुआ था. सूत्रों की मानें तो कैबिनेट का बंटवारा भी इसी तरह जदयू चाह रहा है.

क्या कहते हैं आंकड़े



आंकड़े बताते हैं कि बिहार कैबिनेट में मैक्सिमम 36 मंत्री ही हो सकते हैं. इस तरह दोंनो दलों के विधायकों के आंकड़ों को लिया जाए तो जदयू कोटे से 12 से 14 तो बीजेपी के कोटे से 20 से 22 मंत्री बन सकते हैं. वीआइपी और हम पार्टी के भी एक-एक मंत्री होंगे. वर्तमान में इन दोनों दलों से एक-एक मंत्री हैं. हम से जीतनराम मांझी के बेटे संतोष मांझी हैं तो वीआइपी से खुद पार्टी सुप्रीमो मुकेश सहनी बने हैं. जदयू के एक मंत्री मेवालाल चौधरी को भ्रष्टाचार के आरोप के कारण इस्तीफा देना पड़ा. दोनों ही दलों में नेताओं की लंबी कतार है. सबसे ज्यादा परेशानी जदयू के साथ है. कोटा कम है और नेताओं की कतार अधिक. कैबिनेट विस्तार का एक बड़ा कारण ये भी है. जबकि, बीजेपी की अंदरुनी चाहत है कि बिहार में मिले नए जनादेश के अनुसार ही कैबिनेट में दलों को जगह मिले.

बीजेपी की नजर दिल्ली पर

सूत्रों के अनुसार, प्रदेश बीजेपी की नजर दिल्ली पर टिकी है. शीर्षस्थ नेताओं तक यहां की बातें पार्टी लेवल से पहुंचा दी गई है. मंथन का दौर चल रहा है. बीजेपी की सेंट्रल टीम बीच का रास्ता निकालना चाहती है. खरमास ने पार्टी को सोचने के लिए माह भर का समय दे दिया है. ऐसे में अब खरमास के बाद यानी ही इस पर ठोस निर्णय लेने की उम्मीद है. मकर संक्रांति तक इसी प्रकार सियासी गणितों पर मंथन चलता रहेगा.