रात में ‘लौंडा नाच’ करते हैं ललित, दिन में कम्पटीशन की तैयारी, पत्नी देती है हौसला

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पटना : कहते हैं कि समय बेहद ताकतवर होता है, उससे कोई नहीं जीत सकता. लेकिन मुसीबतों से टकराकर जीतने वाले ही इंसान होते हैं और वह समय को भी बदल दिया करते हैं. मुसीबतें ही इंसान के धैर्य की परीक्षा लेती हैं कि इंसान उनसे टक्कर लेगा या फिर हमेशा के लिए टूट जाएगा. मुसीबतों से जूझकर जिन्दगी से लोहा लेने वाले एक शख्स से मिलना आपके लिए बेहद दिलचस्प हो सकता है. क्योंकि उसका काम ऐसा है जिसे समाज में कथित रूप से अच्छा नहीं समझा जाता है. लेकिन अपने सपनों को पूरा करने के लिए उसे उसी राह से निकलना होता है.

 

जिंदगी से है जंग

हम बात कर रहे हैं पटना के दनियावां के रहने वाले ललित कुमार की, ललित अभी सिर्फ 22 साल के हैं. ग्रेजुएशन पास कर चुके हैं. आईटीआई में एडमिशन भी ले चुके हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन ललित का सिर्फ इतना ही परिचय काफी नहीं है. ललित रात में शादी—पार्टियों में लौंडा नाच में नाचने के लिए जाते हैं.

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ललित महादलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता सांप पकड़ने का काम करते हैं. ललित के लिए यही उनकी जीविका का आधार है. पिता को सांप पकड़ने के एवज में कभी 200 तो कभी 300 रुपये मिल जाते हैं. महीने भर में अगर 20 सांप भी पकड़ लिए तो इतना पैसा कई बार नहीं हो पाता है कि ललित के घर के चूल्हे में आग जल सके, और उनके पेट की आग की बराबरी कर सके.

12 साल की उम्र में शुरू किया था डांस

ललित को कक्षा आठ में पढ़ते वक्त पहली बार लौंडा नाच में नाचने का आॅफर मिला था. लड़का छोटा था और आवाज अच्छी थी. गांव के ही लोकगायक और मंडली चलाने वाले विजय यादव की निगाह ललित पर पड़ गई. लड़का उम्र में कम था लेकिन जब गांव में किसी की शादी में गाना बजता था तो नाचता भी अच्छा था और गाता भी. विजय यादव ने उसे गाने और नाचने की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया. इसके बाद ललित ने पहला प्रोग्राम अपने ही गांव में किया. इस प्रोग्राम के एवज में उसे पहली बार महज 75 रुपये मिले थे. दूसरे प्रोग्राम में महज 100 रुपये मिले थे. आज ललित को लौंडा पार्टी में नाचते हुए करीब नौ साल हो चुके हैं. आज ललित को एक प्रोग्राम के एवज में 1000 से 2000 रुपये के बीच मिल जाते हैं.

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पहली प्रस्तुति के बाद हुई थी घृणा

ललित अपने पहले प्रोग्राम के अनुभव को जब बताते हैं तो उनका दर्द उनकी आवाज से साफ समझा जा सकता है. ललित कहते हैं, ‘जब पहली बार उन्होंने प्रोग्राम किया था तब तैयार होते वक्त उन्हें खुद से घृणा सी हुई. मन ने सोचा कि क्या हूं और क्या बन रहा हूं? क्या करना चाहता हूं और क्या कर रहा हूं? लेकिन फिर मन ने ही हौसला दिया कि धीरज रखो! सपने शायद यहीं से पूरे हों.’ इसके बाद जब पैसे बढ़ने लगे तो ललित ने अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाना शुरू कर दिया. ललित लौंडा नाच के पैसों से ही अपनी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते हैं.

 

जब पत्नी के सामने किया था डांस

ललित शादीशुदा हैं. महज पांच साल की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया था. जिन्दगी में एक पल ऐसा भी आया जब उन्हें अपनी पत्नी के सामने ही लौंडा नाच करना पड़ा. जब उन्हें हिचक हुई कि आखिरकार पत्नी के सामने कैसे कदम थिरकेंगे? तो हौसला ललित की पत्नी ने ही दिया कि सब्र रखिए, एक दिन सब ठीक हो जाएगा. आप मेहनत कर रहे हैं यही मेहनत एक दिन हमारे दिन बदल देगी. ललित बताते हैं कि उन्हें साल भर में करीब 30—40 प्रोग्राम लौंडा नाच के मिल जाते हैं. इस प्रोग्राम से जो पैसे मिलते हैं. वह उनकी स्कूली फीस और बाकी के खर्चों को पूरा करने में काम आ जाते हैं.

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अप्राकृतिक सेक्स की भी होती है मांग

ललित बताते हैं कि लौंडा नाच के दौरान माहौल अच्छा नहीं होता है. तमाम लोग यह जानते हुए भी कि आप लड़की नहीं लड़का हैं, आपसे छेड़खानी करने से बाज नहीं आते हैं. कई बार लोग अप्राकृतिक सेक्स के लिए भी आॅफर करते हैं, कभी पैसे के बल पर तो कई बार बंदूक और ताकत के बल पर. शुरुआत में इन सभी दिक्कतों से भी जूझना पड़ा लेकिन अब हालात थोड़े बदल गए हैं. प्रोग्राम तय करने से पहले ही पूछ लिया जाता है कि आप इस मिजाज के हैं या नहीं हैं.

अगर हां तो हां और नहीं तो फिर नहीं. लौंडा नाच के बारे में ललित के गुरू और लोकगायक विजय यादव बताते हैं कि लौंडा नाच बिहार की बेहद पुरानी परंपरा है, इस परंपरा में लड़के लड़कियों के कपड़े पहनकर मर्दों के बीच डांस करते हैं. इस दौरान उनसे जमकर छेड़खानी भी की जाती है. लेकिन इस परंपरा का जोर इतना है कि अगर आपने शादी—ब्याह में लौंडा नाच नहीं करवाया तो प्रोग्राम को फीका मान लिया जाता है.

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सपने, जो सोने नहीं देते

ललित इस समय दनियावां में एक कोचिंग संस्थान से जनरल कम्पटीशन की तैयारी कर रहे हैं. उम्मीद है कि अगर उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई तो इस काम से छुटकारा मिल जाएगा. ललित को अहसास है कि जो काम वह कर रहा है, दुनिया उसे हिकारत भरी नजरों से देखती है. लेकिन अपने सपनों की तलाश में दौड़ते ललित चाहते है कि पूरी दुनिया उन्हें जाने, कि यह भी एक लड़का है पूरी दुनिया में. जिसने अपने सपनों को इस तरह से अंजाम दिया है. ललित की आंखों में आज सपने हैं और उन्हें पूरा करने का जज्बा उससे भी बढ़कर है. ललित नज़ीर है उन लोगों के लिए जो सुविधाओं के बावजूद मौका न मिलने का रोना रोते रहते हैं, शायद यही नजीर उनकी भी दुनिया बदल दे.