10वां पटना फिल्मोत्सव : तीसरे दिन दिखी भिखारी ठाकुर की झलक

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क: हिरावल द्वारा आयोजित 10 वें पटना फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत युवा फिल्मकारों और सिनेमा के विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई फिल्मों से हुई ‘नये प्रयास’ सत्र में युवाओं और सिनेमा विद्यार्थियों की पांच लघु फिल्मों- वुमानिया, गुब्बारे, छुट्टी, बी-22 और लुकिंग थ्रूूू फेंस का प्रदर्शन हुआ. ‘वुमानिया’ बिहार में एक महादलित टोले में बनाए गए ‘सरगम’ बैंड से जुड़ी महिलाओं की सफलता की गाथा है.

युवाओं और सिनेमा विद्यार्थियों की पांच लघु फिल्मों को किया गया प्रदर्शित

वहीं ‘बी-22’ और ‘लुकिंग थ्रूूू फेंस’ क्रिएटिव डाक्युमेंटरी कोर्स के छात्रों द्वारा निर्मित थी. दोनों ही फिल्मों ने महानगर में गरीबों के प्रति मकान मालिकों और अर्पाटमेंट्स में रहने वाले उच्च और मध्यम वर्ग के दोयम दर्जे के व्यवहार पर सवाल उठाए। जो गरीब हैं, उनके रास्ते तक बंद कर दिए जाते हैं, दैनिक व्यवहार में इस्तेमाल के लिए पानी भी उन्हें सहजता से हासिल नहीं होता. ‘छुट्टी’ आईआईटी से जुड़े लोगों द्वारा बनाया गया एक म्यूजिकल वीडियो था.

भिखारी ठाकुर पर बनी फिल्म ‘नाच, भिखारी नाच’ का प्रदर्शन

इस दौरान बिहार की लोक संस्कृति के पूरोधा, लोकनाटककार और नर्तक भिखारी ठाकुर को ‘नाच, भिखारी नाच’ भिखारी ठाकुर को मूर्त किया गया. फिल्म ‘नाच, भिखारी नाच’ भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके चार कलाकारों रामचंद्र मांझी, शिवलाल बारी, लखिचंद मांझी एवं रामचंद्र मांझी की स्मृतियों, गीत-संगीत की उनकी प्रस्तुतियों और बातचीत पर आधारित था. इनके जीवनानुभवों के जरिए महान लोकनाटककार और लोकनर्तक भिखारी ठाकुर भी एक तरह से मूर्त हो उठते हैं। इस फिल्म को देश-दुनिया के कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं.

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भिखारी ठाकुर जिन्होंने सन 1917 में अपने नाच-नाटक दल बनाकर बिदेशिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, भाई-विरोध, गबरघिचोर, पिया निसइल सहित एक दर्जन से अधिक नाटक और गीत-नृत्य के माध्यम से तत्कालीन भोजपुरी समाज की समस्याओं और कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम किया था, उस महान लोकनाटककार और लोकनर्तक के भोजपुरी भाषी समाज पर पड़े व्यापक प्रभाव की मानो यह फिल्म शिनाख्त करती है. इस फिल्म के निर्देशक जैनेंद्र दोस्त और शिल्पी गुलाटी थे. फिल्म की प्रस्तुति के बाद दर्शकों का निर्देशक जैनेंद्र दोस्त से संवाद भी हुआ.

भिखारी ठाकुर आज भी प्रासंगिक हैं : जैनेंद्र दोस्त

आज ‘नाच, भिखारी नाच’ के फिल्म निर्देशक जैनेंद्र दोस्त ने एक ‘प्रेस कान्फ्रेन्स’ में यह कहा कि भिखारी ठाकुर हमारे बहुत बड़े लोक-कलाकार हैं. इसीलिए उन्होंने भिखारी ठाकुर के लोकनाटकों और भोजपुरी की संस्कृति तथा लौंडा नाच के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ पर शोध किया. उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके कलाकार उनके नाच और रंगमंच को साकार करते हैं.

यह फिल्म इसका अहसास कराती है कि जब भिखारी ठाकुर खुद अपनी प्रस्तुति देते होंगे, तो कैसा जादुई प्रभाव होता होगा- जैनेंद्र ने कहा कि भिखारी ठाकुर ने रोजी-रोटी के लिए विस्थापन, स्त्री के सम्मान, नशा के कुप्रभाव, संयुक्त परिवार में बढ़ती विभाजनकारी प्रवृत्ति जैसी समस्याओं को उठाया था, वे सवाल अब भी खत्म नहीं हुए हैं- भिखारी ठाकुर आज भी प्रासंगिक हैं.

जनकवि विद्रोही की जिंदगी और कविता से रूबरू हुए दर्शक

‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ जनकवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ के जीवन और कविता-कर्म पर आधारित फिल्म थी. इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक नितिन की यह दूसरी फिल्म है. इसे प्रतिरोध का सिनेमा अभियान से जुड़े कई फिल्म महोत्सवों में दिखाया जा चुका है. ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ भी एक नये और युवा फिल्मकार की फिल्मों के विषय के चुनाव संबंधी दृष्टि और समझ को सामने लाती है. विद्रोह, प्रतिरोध, परिवर्तन और क्रांति की अदम्य भावनाओं वाली कविता ही उनकी जिंदगी की पहचान थी.

‘लिंच नेशन’: हिंसा और नफरत की राजनीति का प्रतिकार

आज की अंतिम फिल्म ‘लिंच नेशन’ आज के समय की ज्वलंत समस्या पर केंद्रित थी। पिछले साल चलती ट्रेेन में 16 साल के लड़के जुनैद की भीड़ द्वारा हत्या से मर्माहत दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार अशफाक ने अपने पत्रकार दोस्तों फुरकान अंसारी, विष्णु सेजवाल और शाहीद अहमद से सलाह-मश्वरे के बाद पूरे देश में ‘माॅॅब लिंचिंग की घटनाओं को दस्तावेजीकृत करने का निर्णय लिया था. ‘लिंचिंग नेशन’ इसी प्रक्रिया में बनाई गई एक ऐसी फिल्म है, जो उत्पीड़ित परिवारों की व्यथा और उनके सवालों के जरिए दर्शकों को बेचैन करती है और नफरत की उस राजनीति का प्रतिकार करने की भावना से भरती है, जो भीड़ को हिंसक भेड़िये में तब्दील कर रही है.

फिल्म बताती है कि 2014 के बाद से अब तक 77 लोग माॅब लिंचिंग में मारे गए, जिनमें 33 लोगों को गौरक्षकों ने मारा है. फिल्म के निर्माण के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं है. अभी कुछ रोज पूूर्व एक पुलिस इंस्पेक्टर इस हिंसक-उन्मादी भीड़ का शिकार बन चुके हैं. माॅब लिचिंग को प्रोत्साहित करने वाली सत्ता और राजनीति के खिलाफ इस फिल्म ने प्रतिरोध का संदेश दिया, क्योंकि अब यह लग रहा है कि अगर यह सिलसिला नहीं थमा तो हम एक डेमोक्रेटिक नेशन नहीं रह पाएंगे, पूरी तरह यह देश लिंच नेशन बन जाएगा, जिसमें किसी के हिफाजत की गारंटी नहीं होगी.

तीसरे और आखिरी दिन के आकर्षण
फर्दीनांद: स्पानी कहानी पर आधारित बच्चों की फीचर फिल्म, 2 बजे दिन
सरोज दत्ता: एंड हिज टाइम्स, 4ः15 बजे अपराह्न
फिल्म की निर्देशिका मिताली विश्वास से संवाद,
हिरावल द्वारा लूशुन की कहानी ‘पागल की डायरी’ की नाट्य प्रस्तुति, 7 बजे दिन

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