पटना में हॉकरों की हड़ताल खत्म, अखबारों की बढ़ी कीमत पाठक झेलेंगे

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : 28 जनवरी 2018 से पटना में अखबारों के हॉकरों की चल रही हड़ताल आज 2 फरवरी को समाप्त हो गई . सुबह में लोगों के घरों में अखबार पहुंचे हैं . हड़ताल हॉकरों के सभी यूनियनों के साथ अखबार मैनेजमेंट के हुए समझौते के बाद खत्म हुई है . हॉकरों को अब बढ़ा हुआ कमीशन प्राप्त होगा . पिछले 10 वर्षों से पटना में अखबारों के हॉकरों कमीशन नहीं बढ़ा था . हड़ताल के बाद हुए समझौते को पटना के हॉकरों ने अपनी जीत करार दिया है . कह रहे हैं, चार दिनों में अखबारों के मैनेजमेंट को झुकना पड़ा .

प्राप्त जानकारी के मुताबिक पटना के हॉकरों को अब प्रति अखबार न्यूनतम डेढ़ रुपये का कमीशन प्राप्त होगा . अभी प्रति अखबार 1 रुपये 20 पैसे मिल रहे थे . हॉकरों के संगठनों ने अखबार मालिकों को स्पष्ट कर दिया है कि वे कई तरीकों के ऑफर्स के कारण अखबार का कवर प्राइस जो भी रखें, हॉकर कमीशन डेढ़ रुपये से कम नहीं होगा. पटना में कहीं नहीं मिल रहा अखबार, लगे जिंदाबाद के जोरदार नारे

अख़बार की प्रति

हॉकरों से हुए समझौते के बाद पटना में अखबारों की कीमत बढ़नी शुरु हो गई है . पटना में आज पाठकों को हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबार 5 रुपयों में मिले . दैनिक भास्कर 4 रुपये का था . टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान जैसे अखबार पहले से ही हिंदी अखबारों की तुलना में महंगे थे . अब कीमत थोड़ी और महंगी हो जाएगी.

खबर आ रही है कि हिंदुस्तान अखबार अब पटना में हफ्ते के सभी सात दिनों में 5 रुपयों के होंगे . हिंदुस्तान बढ़ी कीमत पर हॉकरों को 25 पैसे का अधिक बोनस भी देने को तैयार है . दैनिक जागरण की कीमत हफ्ते में दो दिन 5 रुपये और शेष पांच दिनों में 4 रुपये होगी . दैनिक भास्कर भी अलग-अलग दिनों में 4 और 3 रुपयों का होगा . दैनिक भास्कर ने पटना में लंबे समय के लिए पाठकों की एडवांस बुकिंग ले रखी है . प्रभात खबर 3 रुपयों के कवर प्राइस में अठन्नी बढ़ाने की तैयारी कर रहा है .

पटना में अखबार वैसे भी देश के कई दूसरे प्रदेशों की राजधानी से अधिक महंगी पहले से रही है . अखबार मालिकों का रोना यह रहा है कि बिहार में कल-कारखाने हैं नहीं, ऐसे में विज्ञापन बहुत कम हैं . सबसे अधिक विज्ञापन सरकार से ही प्राप्त होती है . इस कारण अखबारों की एडिटोरियल पॉलिसी भी प्रभावित होती रहती है . फिर ऐसे में आंदोलन के कारण जब हॉकर कमीशन बढ़ रहे हैं, तो वे अखबारों की कीमत बढ़ाने के सिवाय और कुछ कर भी नहीं सकते .

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