राष्ट्रपति चुनाव : विपक्ष का साझा कैंडिडेट कौन, शरद यादव तो नहीं !

नई दिल्ली : देश के राष्ट्रपति का चुनाव जुलाई महीने में होना है . कैंडिडेट तो भाजपा भी अभी तय नहीं कर पायी है . लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर तो ग्रहण लग ही गया दिख रहा है . तय नरेन्द्र मोदी और मोहन भागवत करेंगे . जून महीने में उम्मीदवारी घोषित होनी है .  

चुनाव में विपक्ष भी उम्मीदवार देगा . जीत-हार अलग है . लेकिन,महत्वपूर्ण यह है कि जब नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी देश में अपराजेय बढ़ रही है,तो क्या मुकाबले को विपक्ष सचमुच साझा प्लेटफार्म तैयार कर सकेगा . अब तो सभी विपक्षी दल कहने लगे हैं, एक न हुए तो ख़त्म हो जाएंगे . यूपी का चुनाव परिणाम स्पष्ट संदेश है . मुलायम सिंह यादव और मायावती का पोलिटिकल वोल्टेज कम हो गया है . डंके की चोट पर सिर्फ नीतीश कुमार-लालू प्रसाद-ममता बनर्जी कहने की स्थिति में हैं कि उन्होंने नरेंद्र मोदी-अमित शाह को हराया है . पर,आगे टास्क बहुत टफ है,यह इन्हें भी पता है . कांग्रेस अकेले लड़ने की स्थिति में नहीं है . पंजाब में जीत मिली,तो फैक्टर बिलकुल जुदा थे .



राष्ट्रपति चुनाव में साझा उम्मीदवार विपक्षी दलों के भविष्य के एका का लिटमस टेस्ट होगा . मधुलिमये को याद करने का अवसर निकाल सोमवार 1 मई को कई क्षेत्रीय क्षत्रप जमा हुए . सेक्रेट एजेंडा में राष्ट्रपति चुनाव का विमर्श भी था . वैसे,ममता बनर्जी तो यह कह चुकी हैं कि भाजपा लालकृष्ण आडवाणी को उम्मीदवार न बनाये, तो विपक्ष को बना देना चाहिए . लेकिन सभी जानते हैं कि यह बेसिर-पैर की बात है .

साझा उम्मीदवार की चर्चा को लेकर बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार कांग्रेस प्रेसीडेंट सोनिया गांधी से मिल चुके हैं . राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की बातें भी हुई है . कांग्रेस को पता है कि बिना रायशुमारी निर्णय लेने की स्थिति अभी नहीं है . सो,ठीक से लड़ना है तो सबों की सहमति से उम्मीदवार तय करना होगा .

जब से विपक्ष के साझा उम्मीदवार की बात चली,शरद यादव की एक्टिविटी बहुत बढ़ी हुई है . वे देश के कई प्रदेशों का दौरा कर विपक्षी एका का प्रयास करने में लगे हैं . उनके नाम को नीतीश कुमार-लालू यादव भी आगे बढ़ाना चाहेंगे . मध्य प्रदेश में जन्मे शरद यादव की राजनीतिक कर्म भूमि बिहार रही है . मधेपुरा से सांसद रहे . 2014 में वे पप्पू यादव से हार गए थे . फिर नीतीश कुमार ने इन्हें राज्य सभा भेजा . पर जदयू के नेशनल प्रेसीडेंट का कार्यकाल ख़त्म होने के बाद बिहार में शरद यादव के लिए बहुत पोलिटिकल स्पेस बचा नहीं है . पार्लियामेंटेरियन के रुप में शानदार पारी रही है . दावा उम्मीदवारी से सामाजिक संदेश देना भी है .

कांग्रेस देश में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है . ऐसे में,वह भी  अपनी दावेदारी का त्याग आसानी से नहीं करना चाहेगी . कांग्रेस के भीतर नाम तो कई चल रहे है,पर इनमें मीरा कुमार का नाम सबों की नोटिस में है . मीरा कुमार लोक सभा की अध्यक्ष रहीं . महिला हैं,दलित हैं,साथ में बेदाग भी . बाबू जगजीवन राम की पुत्री तो हैं ही . बिहार से भी हैं . मीरा कुमार 2014 में लोक सभा चुनाव सासाराम में भाजपा के छेदी पासवान से हार गईं थी .

कांग्रेस में अकेला नाम मीरा कुमार का नहीं है . एक-दो ट्राइबल लीडर्स के नाम भी चल रहे हैं . पर,परेशानी यह है कि नाम ऐसा हो,जिस पर सभी दूसरे दल भी सहमत हो जाएं . यह आसान नहीं है . फिर,भाजपा के उम्मीदवार के समीकरणों को भी जान लेना होगा . तेजी से नाम तो मुंबई से एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार का भी आगे आया है .

लेकिन,अंत में पोलिटिकल जानकार यह भी कह रहे हैं कि बगैर विवाद पूर्ण सहमति और मन से स्वीकृति को लेकर किसी गैर पोलिटिकल शख्स की तलाश भी जारी है,जो देश भर में जाना-पहचाना जाता हो और इनकी उम्मीदवारी से पॉजिटिव संदेशा 2019 के असली युद्ध को लेकर देश भर में पहुंचे .

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