नहीं रहे देश के एक और राजनीति का पुरोधा, रामविलास पासवान का राजनीतिक सफर कुछ ऐसा था…

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : 74 साल की उम्र में केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान इस दुनिया को अलविदा कह गए. दिल्ली के एस्कॉर्टस अस्पताल में उनका निधन हो गया. पिछले कई दिनों से वो अस्पताल में भर्ती थे. लंबे समय से रामविलास पासावन बीमार चल रहे थे. उनके निधन की जानकारी लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने ट्वीट कर दी.

इस खबर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गयी है. भारतीय दलित राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक थे रामविलास पासवान. वे लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी हैं. वे 16वीं लोकसभा में बिहार के हाजीपुर लोकसभी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे.



5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया जिले के शाहरबन्नी गाँव में एक अनुसूचित जाति परिवार में रामविलास पासवान का जन्म हुआ था. उन्होंने 1 9 60 के दशक में राजकुमारी देवी से शादी की. लोकसभा नामांकन पत्रों को चुनौती देने के बाद 2014 में खुलासा किया कि उन्होंने 1 9 81 में उन्हें तलाक दे दिया था. उनकी पहली पत्नी राजकुमारी से उषा और आशा दो बेटियां हैं. 1 9 83 में अमृतसर से एक एयरहोस्टेस और पंजाबी हिन्दू रीना शर्मा से विवाह किया. उनका एक बेटा और बेटी है. उनके बेटे चिराग पासवान एक अभिनेता से बने राजनेता हैं.

रामविलास पासवान पिछले 32 वर्षों में 11 चुनाव लड़ चुके हैं और उनमें से 9 जीत चुके हैं. इस बार उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा लेकिन सत्रहवीं लोकसभा में उन्होंने मोदी सरकार में एक बार फिर से उपभोक्ता मामलात मंत्री पद की शपथ ली. पासवान जी छः प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके हैं.

चुनावी जीत का रिकॉर्ड कायम करने वाले पासवान उसी हाजीपुर से 1984 में भी हारे थे जहाँ से वे रिकार्ड मतों से जीतते रहे, पर जब 2009 में उन्हें रामसुंदर दास जैसे बुज़ुर्ग समाजवादी ने हरा दिया तो उन्हें एक नया एहसास हुआ कि वे अपना दलित वोट तो ओबीसी की राजनीति करने वालों को दिला देते हैं, लेकिन उन्हें ओबीसी वोट नहीं मिलता. उन्हें ओबीसी तो नहीं, लेकिन अक्सर अगड़ा वोट मिल जाता है. इस बार एससी/एसटी ऐक्ट पर उनके रुख के कारण अगड़ी जाति के लोग उनसे नाराज़ बताए जाते हैं.

2005 से 2009 रामविलास के लिए बिहार की राजनीति के हिसाब से मुश्किल दौर था. ऐसा 1984 में चुनाव हारने पर भी हुआ था लेकिन तब उनका कद इतना बड़ा नहीं था और 1983 में बनी दलित सेना के सहारे वे उत्तर प्रदेश के कई उप-चुनावों में भी किस्मत आज़माने उतरे थे. हार तो मिली लेकिन दलित राजनीति में बसपा के समानांतर एक छावनी लगाने में सफल रहे.

2005 में वे बिहार विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने या लालू-नीतीश की लड़ाई के बीच सत्ता की कुंजी लेकर उतरने का दावा करते रहे. एक तो नीतीश कुमार ने उनके 12 विधायक तोड़कर उनको झटका दिया और राज्यपाल बूटा सिंह ने दोबारा चुनाव की स्थिति बनाकर उनकी राजनीति को और बड़ा झटका दिया.

नवंबर में हुए चुनाव में लालू प्रसाद का 15 साल का राज गया ही, रामविलास की पूरी सियासत बिखर गई. बिहार में सरकार बनाने की चाबी अपने पास होने का उनका दावा धरा रह गया. वे चुपचाप केंद्र की राजनीति में लौट आए. लालू की तरह वे भी केंद्र में मंत्री बने रहे.