International Women’s Day : 60 साल की उम्र में चलाती हैं साइकिल, घर-घर दूध बेचकर चलाती हैं जीविका; जानिए, बहादुर शीला बुआ की कहानी

  • शादी के एक साल बाद हो गयी थीं विधवा
  • पूरे परिवार की जिम्मेदारी सिर पर आयी
  • बिना हार माने की जी तोड़ मेहनत

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : कल्पना चावला, सरोजिनी नायडू, किरण बेदी, नीरजा भनोत, मैरी कोम, जैसी कई महिलाएं हैं जिन्होंने हमारे देश का नाम ऊंचा किया है. अपने बहादुर फैसलों के लिए ये सभी जानी जाती हैं. लेकिन कई महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्हें कोई नहीं जनता लेकिन उन्होंने ऐसे ऐसे काम किये हैं जिनके बारे में जान कर आपको गर्व होगा. और प्रेरणा भी मिलेगी. लाइव सिटीज की इस खास सीरीज में आज कहानी बहादुर शीला बुआ की.

नियति इंसान से वह काम भी करवाती है, जो उसने कभी सोचा नहीं था. कुछ ऐसा ही हुआ शीला बुआ साथ. 40 वर्षों पूर्व नियति के खेल में उनका सुहाग उजड़ गया और फिर वे कासगंज में उनके मायके में आ गयीं. किस्मत ने भले ही उन्हें विधवा का लिबास पहना कर उनके जीवन में सूनापन भर दिया हो लेकिन शीला बुआ ने कठिन परिस्थितियों के बीच न सिर्फ़ ख़ुद को संभाला बल्कि मायके में रह कर अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी उठाई. अब पिछले 24 सालों से पशुपालन करके गुज़ारा चला रहीं हैं. अब उनके पास 5 भैंसे हैं और जिनसे रोजाना करीब 40 लीटर दूध प्राप्त हो जाता है. चलिए जानते हैं इनकी पूरी कहानी…

शादी के एक साल के अंदर ही पति चल बसे

शीला बुआ जो अभी 62 वर्ष की हैं, वे इतनी बड़ी आयु की होकर भी साईकिल पर चढ़कर घर-घर जाकर दूध बेचती हैं और अपने परिवार का पालन पोषण कर रही हैं. दरअसल खेड़ा के रहने वाले रामप्रसाद जी की बड़ी बेटी शीला जी की शादी 40 वर्षों पूर्व 1980 में अवागढ़ के रामप्रकाश के साथ कराई गई थी, परंतु भाग्य के आगे किसका बस चला है? अभी उनकी शादी को एक वर्ष भी पूरा ने नहीं हुआ था कि उनके पति की अकस्मात मौत हो गई. फिर पति के गुजर जाने के बाद वे फिर से मायके आकर रहने लगीं. जब उन्होंने फिर से शादी के बारे में सोचा तो उनके भैया कैलाश बीमारी के चलते गुज़र गए. फिर शीला बुआ ने शादी का विचार छोड़ दिया और अकेले ही जीवन व्यतीत करने का फ़ैसला किया.

पहले शुरू किया था खेती का काम

पति के गुजर जाने के बाद शीला बुआ अपने मायके में ही रहते हुए पिताजी के साथ मिलकर खेती का काम करने लगी थीं. धीरे-धीरे उनकी चार बहनों और भाई विनोद का भी विवाह करवा दिया गया. फिर इसके बाद वर्ष 1996 में इनके पिताजी भी चल बसे और कुछ भी समय बाद इनकी माँ का भी स्वर्गवास हो गया. पिताजी और माँ के मृत्यु के बाद उनके सारे परिवार की जिम्मेदारी शीला बुआ ने उठाई. वह पढ़ी-लिखी नहीं थी इसलिए कोई नौकरी नहीं कर सकती थीं.

उन्होंने पहले एक भैंस खरीदी, फिर दूध बेचने का काम शुरू किया. वह साइकिल पर घूम-घूम कर घरों में जाकर से दूध बेचने लगी. अब उन्हें सभी लोग शीला के नाम से ही पुकारते हैं. इस प्रकार से धीरे-धीरे करके उनका दूध बेचने का व्यापार बढ़ता चला गया. अब उनके पास पांच भैंसे हो गई हैं, वे रोज़ सुबह चार बजे उठकर दूध की टंकियां भरकर साइकिल पर बेचने के लिए निकल पड़ती हैं.

बिना थके उठाती हैं सारे परिवार की जिम्मेदारी

शीला बुआ कहती हैं कि उनके ऊपर अभी बहुत-सी जिम्मेदारियां हैं, इसलिए वह चाहे तो भी बीमार नहीं हो सकती हैं. शीला बुआ के भाई विनोद की 6 पुत्रियां हैं, जिनमें से बड़ी पुत्री सोनम भी विधवा हैं और उनके ही पास रहती हैं. सोनम की भी 6 बेटियां हैं. इस प्रकार से उनके मायके में व्यक्तियों की संख्या ज़्यादा है, जिन्हें संभालने के लिए शीला बुआ इस उम्र में भी मेहनत करती हैं.

शीला बुआ ने अपने जीवन में सारे संघर्षों से लड़कर सूझबूझ और मेहनत के साथ परिवार की परवरिश की. उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया बल्कि ख़ुद आत्मनिर्भर बनीं. उनके हौसले और जज्बे को हम सलाम करते हैं. आज शीला बुआ जैसी महिलाएं नारी सशक्तिकरण का जीता जागता उदाहरण हैं. जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का श्रोत बनी रहेंगी.