तीन तलाक यदि मजहबी मुद्दा तो सुप्रीम कोर्ट नहीं देगा दखल

लाइव सिटीज डेस्क : सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक जैसे ऐतिहासिक मुद्दे पर शुरू हुई सुनवाई पर एक बार फिर ग्रहण लगने के आसार हैं. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गुरुवार से तीन तलाक की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर ऐतिहासिक सुनवाई तो शुरू कर दी.

लेकिन साथ यह भी कह दिया कि कोर्ट पहले यह निर्धारित करेगा कि क्या यह परंपरा इस्लामी मजहब का हिस्सा है और उसके बुनियादी तत्वों में शामिल है. अगर ऐसा है तो कोर्ट इस पर सुनवाई नहीं करेगा.  
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने शुरू में स्पष्ट कर दिया है कि मुस्लिमों में बहुविवाह, निकाह और हलाला के मुद्दे पर बहस नहीं होगी. क्योंकि ये तीन तलाक के मुद्दे से जुड़े नहीं है. पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस कुरियन जोसेफ, आर एफ नरिमन, उदय यू ललित और अब्दुल नजीर शामिल हैं.
शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि तीन तलाक धर्म का बुनियादी तत्व है तो वह इसकी संवैधानिक वैधता के सवाल पर विचार नहीं करेगी. लेकिन यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि पुरुष द्वारा दिया गया तीन तलाक अवैध है तो यह भी देखना होगा कि यदि पुरुष तलाक चाहता है तो उसके सामने क्या कानूनी उपाए हैं.

पीठ ने यह भी कहा कि वह इस पहलू पर भी विचार करेगी कि तीन तलाक संविधान के तहत धर्म को मानने के लिए लागू करने योग्य मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25) का हिस्सा है या नहीं. 
गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले को 30 मार्च 2017 को संविधान पीठ के सुपुर्द कर दिया था. उन्होंने पहले मुद्दे तय करने और उसके बाद रोजाना के आधार पर सुनवाई को कहा था. कोर्ट ने इस मामले का नाम ‘इन रि : मुस्लिम वीमेंस क्वेस्ट फॉर इक्वेलिटी’ (मुस्लिम औरतों की बराबरी के लिए चाह) रखा है.


बता दे कि इस बड़े मुद्दे पर सुनवाई 9 दिन तक चलेगी. वहीं इस मामले में सायरा बानो के वकील अमित चड्ढा ने कहा कि तीन तलाक इस्लाम का मूलभूत तत्व नहीं है, इसलिए इसे खत्म किया जा सकता है. यह गलत भावना है कि तीन तलाक मुस्लिम धर्म का हिस्सा है.

इस्लाम में महिलाओं के सशक्तीकरण का बात कही गई है, लेकिन तीन तलाक अनिर्देशित और बिना किसी कारण के दिए जाता है. इसके बाद महिला के लिए कोई मंच मौजूद नहीं है, जहां जाकर वह अपने अधिकारों के लिए लड़ सके. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भी कहा है कि विवाह एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है, जिसमें दो लोग अपनी स्वतंत्र मर्जी से एक दूसरे के साथी बनते हैं, ये किसी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता.

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