मीडिया की आजादी पर क्यों वायरल हुई अरूण शौरी की तकरीर, पढ़कर देखिए

arun shourie

लाइव सिटीज डेस्क : मीडिया समूह एनडीटीवी के प्रमोटर्स प्रणव रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय के घर पर पड़े सीबीआई के छापों के बाद से एक बार फिर मीडिया को दबाने की सरकार की कोशिश पर चर्चा हो रही है. इसी को लेकर मीडिया जगत के तमाम लोग प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पहुंचे और एकजुट होने की अपील की. इसी बीच वरिष्ठ पत्रकार और कभी राजनेता रहे अरूण शौरी की तेज़ाबी जुबान से निकली यह तकरीर खूब सुर्खियां बटोर रही है. पढ़िए क्या कहा है इन्होंने –

मेरे प्रिय मित्रों,

मैं सबसे पहले नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा करता हूं. उनकी वजह से मेरे इतने सारे दोस्त एक साथ इकट्ठा हुए हैं. और मैं इसके लिए एक शेर सुनाता हूं-

तुझसे पहले जो यहां तख्तनशीन था,
उसको भी अपने खुदा होने का उतना ही यकीन था.

लेकिन ये पाकिस्तानी शायर का कलाम है. खुद को बचाने के लिए मैं ग्रंथ से भी पढ़ देता हूं—

राम गयो, रावण गयो, जाको बहु परिवार.

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ये भी जाएंगे. हमको इसी बात का यकीन होना चाहिए. इसमें कोई शक नहीं है. फली नरीमन ने पहले ही फ्रीडम ऑफ स्पीच के बारे में इतनी बढ़िया बात बोल दी है. मैं उस बात का जवाब दूंगा जिसमें निहाल सिंह ने पूछा था कि हमको क्या करना चाहिए? कुलदीप नैयर ने कहा कि इस प्रश्न का जवाब देना इमर्जेंसी के वक्त जरूरी नहीं था. पर हर पीढ़ी को फ्रीडम का मतलब समझाना चाहिए. इस बार फिर ये लेसन शुरू हुआ है. पहली चीज, जो हमें मान लेनी चाहिए कि नया फेज शुरू हो गया है. अभी तक तो सरकार दो हथियार इस्तेमाल कर रही थी. एक था कि एडवर्टिजमेंट देकर मीडिया का मुंह बंद कर देना.

कहावत है कि कुत्ते के मुंह में हड्डी है तो वो नहीं भौंकेगा. दूसरा था डरा के कंट्रोल कर लेना. तुम जानते नहीं हो, मोदी सब सुना रहे हैं? सीबीआई है उसके पास. ये है, वो है. अरे यार, फिर भी आदमी जिंदा है, फिर भी चैनल चल रहे हैं. अब तीसरा लाये हैं. एनडीटीवी वाला. प्रेशर डालना. टोटेलिटेरियन समाज बनाना चाहते हैं. इंडिया में हर क्षेत्र में, जीवन के हर पहलू में ये अपना अधिकार चाहते हैं.

इनके कहने और करने में इतना फर्क है कि आने वाले 2 साल में स्थिति और खराब होगी. किसानों का ही मामला देख लीजिए. हमें जान लेना चाहिए कि आगे ये विरोध में उठती हर आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे. पहली चीज है कि एनडीटीवी ने, फली नरीमन ने सारे फैक्ट रख दिये हैं. सीबीआई उसका जवाब नहीं दे पाई है. द वायर की रिपोर्ट है कि दो बडे़ लोगों के खिलाफ 30 हजार करोड़ रुपयों के फ्रॉड का आरोप है, पर सीबीआई कुछ नहीं कर रही.

हमें एक-दूसरे के खिलाफ जजमेंट में नहीं बैठना है. कि अरे यार वो तो सिगरेट सारी उमर पीता था, उसको कैंसर होना ही था. नहीं. हमें मदद करनी है. नहीं तो, वो हमें बांट देंगे. दूसरी बात कि हमें एक-दूसरे के साथ खड़ा होना है. सिविस सर्वेंट्स में मैंने ये देखा कि वो एक-दूसरे के साथ खड़े नहीं हुए और बेकार मामलों में फंसे.

फली नरीमन ने हिटलर के लिए इस्तेमाल लाइनों का जिक्र किया था. पर 200 साल पुरानी एक और बात भी है-

http://livecities.in/viral-speech-of-veteran-journalist-arun-shourie-on-media-freedom-goes-viral

 

मैंने ये पिछले साल देखा था. जयपुर में पाया कि राजस्थान पत्रिका को जिस हैरेसमेंट से गुजरना पड़ा, दिल्ली के लोगों ने नोटिस नहीं किया. हमें सतर्क रहना होगा. प्रणव रॉय ही नहीं, पूरे देश में डर फैलाया जा रहा है. सारे लोगों पर सरकार नजर बना रही है. पूरी टीम है उनकी. वो देखती है, ट्विटर पर, फेसबुक पर क्या चल रहा है. जब वो जानेंगे कि लोग इकट्ठा हुए हैं, रवीश कुमार जैसे निडर लोग इकट्ठा हुए हैं, उनको लगेगा कि गलत कदम उठा लिया. पत्रकारों के लिए बहुत आसान है. प्रणव रॉय से पूछ लो. क्या फैक्ट हैं. फिर सीबीआई से पूछ लो.

न्यूट्रल होने पर सरकार आपको इस्तेमाल करेगी. ये उदास करने वाली बात है कि हमने एक कम्युनिटी की तरह रिएक्ट नहीं किया है, आरटीआई को दबाया जा रहा है. राजकमल झा कह रहे थे कि लगभग हर आरटीआई रिक्वेस्ट को पहली बार में रिजेक्ट किया जा रहा है. बहुत कोशिश करने पर थोड़ी सूचना मिल रही है.

फ्रीडम के लिए सूचना बहुत जरूरी है. जस्टिस भगवती ने भी यही कहा था. मुझे महसूस होता है कि सरकार जिसको पसंद नहीं करती, उसके खिलाफ सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर झूठ और गालियों का इंतजाम कर देती है. मोदी की एक टीम है. हिरेन जोशी नाम के लड़के के नेतृत्व में. वो सोशल मीडिया देखता है और बताते रहता है कि क्या चल रहा है.

पिछले 3-4 सालों में मैंने देखा है कि कई पत्रकार इसके दबाव में आ गए हैं. ये मत सोचिए कि थोड़ा बहुत करके उनसे रिश्ता अच्छा रख सकते हैं. वेंकैया नाय़डू को इंडियन एक्सप्रेस में तीन चौथाई पेज का आर्टिकल लिखने को मिलता है. कुलदीप जी ने मुझे भी उतनी जगह नहीं दी कभी. पर वेंकैया को तीसरी कक्षा की नोटबुक दे दीजिए, वो एक पेज नहीं लिख सकते. मगर आप उसके आर्टिकल क्यों छाप रहे हो. नहीं, वो आपको बचाने नहीं आएंगे.

कोई मिनिस्टर है ही नहीं. ढाई लोगों की सरकार है. ये बचारे तो स्वामी अग्निवेश के बंधुआ मजदूर हैं, वो हेल्प नहीं कर सकते. हेल्प खोजने की बजाय बॉयकाट कर दो. जैसे दुआ जी ने याद दिलाया. डिफेमेशन बिल. राजीव गांधी का कोई मंत्री आता था तो हम उनसे पूछते कि आप डिफेमेशन बिल के साथ हैं या विपक्ष में. पूरे देश के एडिटर्स को फोन कर के कह दिया गया था. अगर वो जवाब नहीं देता या हां कह देता तो उठ के चले जाते.

पब्लिसिटी ही आतंकवादियों का ऑक्सीजन है. बंधुआ मजदूरी का भी यही है. ये मत दिखाओ कि मोदी को इतनी अच्छी कवरेज दी. बॉयकाट कर दो. मंत्री को मीटिंग में बुलाओ ही मत. करो और इसका असर देखो. इसके बदले ऑल्टन्यूज, फैक्टटेक जैसी साइट्स की चीजें छापो. जो सच बताती हैं. शरद यादव, नरेंद्र मोदी के ट्वीट छापने में क्या रखा है. उसको क्यों जगह देना.

उनकी टेक्नीक है. कुछ गड़बड़ होती है तो एक नई कहानी निकाल देते हैं. तो अपने पाठकों दर्शकों को डिस्ट्रैक्ट मत करो आप. उनको मुद्दे पर बिठाये रखो. दूसरी चीज कि सरकार जिस चीज से परेशान हो रही है, उसको डबल कर दो. अरुण पुरी एक नारा इस्तेमाल करते थे-

News is what the government wants to hide, everything else is propaganda.

हमारे पास तीन प्रोटेक्शन हैं. सॉलिडैरिटी, कोर्ट और हमारे पाठक-दर्शक. तीनों से जुड़े रहिये. आपको मुद्दों की गहराई में जाना चाहिए, पाठकों के लिए ये जीवन मृत्यु का सवाल है. जब कोई हाथ आपके खिलाफ उठे, तो पाठक को लगे कि उनके खिलाफ उठा है.

अंत में, मुझे यकीन है कि एक साल के अंदर मेनस्ट्रीम मीडिया से सूचना लेना असंभव हो जाएगा. तो हमें नौजवानों को प्रेरित करना चाहिए. ये हैकिंग, सरकार के सेंसर को बाईपास करने, इंटरनेट का इस्तेमाल करने में माहिर हैं. अगर चाइनीज लोग चीन की सरकार को बायपास कर सकते हैं तो हम भी कर सकते हैं. इंडिया में या बाहर में, ऐसे ग्रुप बनाइए. वो सारी चीजें कंट्रोल कर सकते हैं, पर इससे घबराइए मत. मैंने कहा कि हर चीज गुजर जाती है. लोग भी देखेंगे कि उनको क्या घुट्टी पिलाई जा रही है और उनके जीवन में क्या बदलाव आ रहा है. तब ये सरकार जो कि गायों की पूजा करती है, अपने हाथ में फटे हुए चीथड़े लिये रह जाएगी.

धन्यवाद.