बेहद विवादित मुद्दा ‘पद्मावती’ पर क्या सोचते हैं DIG विकास वैभव, जरा आप भी पढ़िए

लाइव सिटीज डेस्क : बिहार के तेज-तर्रार और बेहद चर्चित आईपीएस ऑफिसर विकास वैभवविकास वैभव अपने बेहतरीन कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं. क्विक एक्शन लेना उन्हें पसंद है. अपराधी उनसे खौफ खाते हैं. पीड़ितों के लिए वे किसी मसीहा की तरह मदद को तैयार रहते हैं. फिलहाल वे DIG भागलपुर के पद पर हैं. उनपर अभी मुंगेर रेंज की भी जिम्मेदारी है. उन्हें किताबों का बड़ा शौक है. उतना ही शौक उन्हें लिखने का भी है. विकास वैभव ने एक बार फिर एक कविता लिखी है. यह उनकी दूसरी कविता है. इस बार उन्होंने पद्मावती पर बेहतरीन कविता लिख डाली है. जिसे सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है. अगर आप अभी तक नहीं पढ़ें हैं तो यहां पढ़ सकते हैं. कविता के बाद उन्होंने पद्मावती पर चल रहे विवाद पर भी खुल कर लिखा है. अब आप पूरा कविता और फिर उनका संदेश पढ़ कर समझिए कि क्या है #पद्मावती

पद्मावती प्रतीकात्मक तस्वीर

#पद्मावती ( मेरी द्वितीय कविता )



राजपूताने पर गौरवान्वित, कृष्ण मेघारोहण से चिंतित ।

कुलशौर्य प्रति थी आशान्वित, परंतु काल से सशंकित ।

स्वप्नों का युवा संसार था, प्रसिद्ध मधुर व्यवहार था ।

भला किसने यह जाना था, संकट असमय आना था ।

इतिहास ने करवट ली थी, भारतभूमि थी बाह्यपद्दलित ।

था परिवर्तित इन्द्रप्रस्थ, अशांति प्लावन प्रति विचलित ।

क्षत्रकुल परंपरा कर धारण, राणा आक्रमण हेतु तैयार ।

सहन नहीं परतंत्र त्रास, युद्ध या मर्त्यलोक बहिष्कार ।

प्राचीन परंपरा प्रेरणा, रानी को था सर्वाहुति स्वीकार ।

राणा मस्तक पर लगा तिलक, जयाग्नि से सरोकार ।

देख रही असंख्य वीरांगना, पूर्व प्रेरित विचित्र व्यवहार ।

क्षत्रों ने जो ठाना था, नहीं पराजित लौटकर आना था ।

प्राचीरं उपविश पद्मिनी, रण निष्क्रमण प्रति उत्साहित ।

देखती प्रतिज्ञ दृढ़ वीरों को, देवियां थी पूर्ण सुसज्जित ।

मन में मिश्रित भावना, काल से दोष हरण प्रति प्रार्थित ।

समाचार प्रति प्रतीक्षित, देखती थीं सभी नेत्रें विचलित ।

रणभूभि जय हेतु यज्ञागनि, थी सशक्त पार्श्व प्रज्वलित ।

जब सूर्यास्त निकट आया, हताहत दूत सूचना लाया ।

चल रहा था भीषण रण, असंख्य हुआ था म्लेच्छ्मर्दन ।

दुर्गवीरों की संख्या कम थी, पर सहयोग अपेक्षित थी ।

भेजे गए थे दूत चहुँओर, प्राचीन गौरव के रक्षणार्थ ।

पर संदेश नहीं मिल पाया था, काल संभवतः निकटार्थ ।

दुखित अलंकृत देवियां, पूजन कालमुख प्रति समर्पित ।

नहीं हुआ किंतु परिवर्तन, दिशामुख था कालस्थापित ।

यज्ञाग्नि से पवित्र प्रेरित, हो उतिष्ठ पद्मिनी कालजनित ।

किया देवीरूपी उद्बोधन, सुन रही थीं सभी उद्वेलित ।

क्षत्रगौरव नहीं केवल जीवन, सहन नहीं मस्तकमर्दन ।

रणभूभि थी पूर्ण रक्तरंजित, राणा संग वीर दृढ़निश्चित ।

मस्तक नहीं झुकाना था, नहीं गमन कर लौट जाना था ।

तब हुईं देवीयां संकल्पित, म्लेच्छ स्पर्श था अस्वीकृत ।

दुर्गप्राचीरं सूर्यास्त तमसित, यज्ञाग्नि बृहत् रूप दर्शित ।

समेत अश्व तभी दूत दिखा, वीरगति का लिए समाचार ।

सामुहिक हुई कालगर्जना, सुन दुर्गवीरों का रणाचार ।

किया जिन्होंने संपूर्ण ह्रास, कर अस्वीकृत परतंत्र ग्रास ।

कुल गौरव रक्षणार्थ, देवियों का परीक्षण था अब पास ।

देखता रहा संकल्पित काल, यज्ञाग्नि हुई दिव्यालंकृत ।

उत्साहित उत्तेजित आक्रांता, दुर्ग पहुंच अत्यंत विस्मृत ।

विजित रूप में पराजित, सर्व त्याग दर्शन से अचंभित ।

सर्वाग्नि में समाहित, प्रज्वलित अस्थियाँ पूर्ण अलंकृत ।

स्वप्निल पद्माहुति देख, कालमुखाग्नि भी अति व्यथित ।

पङाव इतिहास का, प्रत्यक्ष त्याग भविष्य प्रति प्रेरित ।

इतिहास नहीं करता विस्मृत, पद्मावती है सदैव जीवित ।

(विकास वैभव)

पटना में आवश्यक बैठकोपरांत जब आज मुंगेर की यात्रा पर निकला, तब #यात्री_मन पुनः इतिहास के विषयों में डूबने लगा । हाल ही में ऐतिहासिक प्रेरणा प्रतीक रहीं “रानी पद्मावती” के संदर्भ में उत्पन्न अनावश्यक विवादों के बारे में जब सोचने लगा, तब वर्तमान काल के कई तथाकथित ज्ञानियों के द्वारा किए जा रहे भ्रमित छिछले एवं अज्ञानतापूर्ण प्रयासों से मन विचलित होने लगा । जिस राष्ट्र के भवन तो क्या पुस्तकालयों तक को समूल नष्ट किए जाने के प्रमाण इतिहास साक्षात दर्शाता है, उसके वंशजों को भले ही रानी पद्मिनी के ऐतिहासिकता पर साक्ष्यों के अभाव में आज संदेह हो रहा हो, परंतु क्या इतिहास नकारा जा सकता है । यह सत्य हो सकता है कि पद्मिनी के ऐतिहासिक वैज्ञानिक साक्ष्य आज विस्मृत हो चुके होंगे, परंतु पारंपरिक रूप से भारतीय त्याग के प्रतीक रूप में इतिहास में जो स्थान मिला उसमें कहाँ संदेह है ?

अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की प्रतीकात्मक तस्वीर

यह भी जानना आवश्यक है की पारंपरिक जनश्रुतियों में पद्मिनी का त्याग उस काल की कठिन परिस्थितियों के प्रतीक रूप में सबसे सशक्त बनकर भले उभरा हो, परंतु यह कथा पृथक नहीं है । यदि उस समय के अभिलेखों का निष्पक्ष अध्ययन करेंगे तो जौहर की परंपरा के अनेकानेक उदाहरणों से स्वाभाविक साक्षात्कार होगा । उदाहरण स्वरूप बाबरनामे में मुगल शासक बाबर ने स्वयं चंदेरी दुर्ग पर आक्रमण एवं तत्कालीन राजा के पराजय के पश्चात महिलाओं द्वारा सामुहिक अग्नि चिताओं में समाए जाने का मार्मिक उल्लेख किया है । मुगल शासक अकबर के काल में भी चित्तौड़गढ़ में जौहर का विस्तृत वर्णन मिलता हैं । दिल्ली सल्तनत काल में ग्वालियर दुर्ग का जौहर अत्यंत प्रसिद्ध रहा था और उसी काल के राजपूताने में पद्मिनी के त्याग ने अवश्य ही लोकमानस को अत्यंत झकझोरा होगा जिसने भविष्य के ऐतिहासिक साहित्य में काव्यात्मक रूपी अलंकार प्राप्त किए ।

इसी क्रम में सोचते सोचते जब रानी पद्मिनी समेत अनेक वीरांगनाओं के त्याग के बारे में सोचने लगा, तब कल्पनाओं में पूर्व दृश्य उभरने से लगे और पंक्तियों का रूप लेने लगे । मोदागिरि के दर्शन के पूर्व ही पद्मिनी के त्याग से प्रेरित और स्वतः स्फूर्त जो पंक्तियाँ निर्मित हुईं, उन्हें आपके साथ अपनी #द्वितीय_कविता के रूप में साझा कर रहा हूँ । सर्वशक्तिमान से प्रार्थना है कि पूर्व इतिहास से प्रेरणा लेकर एक बेहतर और अत्यंत शांतिमय भविष्य के लिए हम सभी प्रयत्नशील हों तथा साथ ही सामर्थ्यवान हो ऐतिहासिक गलतियों की पुनरावृत्ति न करें ।

अनावश्यक विवाद बंद हों तथा ॠगवेद की इन सूत्रों (X-192-2) में समाहित दर्शन हमें प्रेरित करे :-

ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ||

(May we move in harmony, speak in one voice; let our minds be in agreement; just as the ancient devas shared their portion of sacrifice together)

समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम् ।

समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ||

(May our purpose be the same; may we all be of one mind. In order for such unity to form we offer a common prayer)

समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:|

समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ||

(May our intentions and aspirations be alike, so that a common objective unifies us all)

जय हिंद !