पुलिस की गोली से निहत्थे गोरखा की मौत के बाद ​दार्जिलिंग में बढ़ी हिंसा और आगजनी, पुलिस की मदद के लिए सेना को बुलाया गया

किशनगंज (अमित झा): बिहार के किशनगंज जिले से दौ सौ किलोमीटर दूर दार्जिलिंग हिल्स में भड़की विरोध, संघर्ष और हिंसा की आग थमने का नाम नहीं ले रही है. थमने की बजाय उल्टे यह और भी व्यापक व तीव्र होती जा रही है. सैलानियों के लिए स्वर्ग कहे जाने वाले दार्जिलिंग में घोर अशांति का आलम है. मुख्यत: चाय और पर्यटन पर टिकी यहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमराती नजर आ रही है. यहां के बिहारी कामगार अपने राज्य लौटने को मजबूर हो गए हैं. अलग गोरखालैंड के लिए यहां चल रह आंदोलन हिंसक और उग्र रूप अख्तिायार कर चुका है.

शनिवार को एक बार फिर पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं जिसने देखते ही देखते ही उग्र रूप धारण कर लिया. पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच जबर्दस्त संघर्ष चल रहा है. उग्र आंदोलनकारियों ने सोनादा रेलवे स्टेशन, ट्रैफिक पुलिस फोर्स स्टेशन, डीएफओ कार्यालय और रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया है. दार्जिलिंग के चौरास्ता में पुलिस के वाहनों को निशाना बनाया गया. हिंसा पर उतारू भीड़ पुलिस वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया. साथ ही दार्जिलिंग, सोनदा, कलिंगपोंग और खर्सियांग सहित अन्य स्थानों पर पुलिस के वाहनों पर पथराव के साथ आंदोलनकारियों द्वारा वाहनों को क्षतिग्रस्त किया जा रहा है.

इसकी शुरूआत शुक्रवार की आधी रात्रि को तब हुई जब पाकी भूटिया नामक एक गोरखा युवक अपने बीमार भाई के लिए आधी रात को दवा लेकर सोनादा आ रहा था कि इस दौरान पुलिस की गोली से उसकी मौत हो गई. इस बीच खबर है कि कल रात पुलिस की गोली से मारे गए निहत्थे ताशी भूटिया के अलावा आज दोपहर हुई हिंसा में सूरज सुंदास और समीर गुरुंग की भी गोली से मौत हो गई.

युवक राष्ट्रीय गोरखा मुक्ति मोर्चा का समर्थक बताया जाता था. शनिवार की अहले सुबह निहत्थे गोरखा की पुलिस की गोली से हुई मौत की खबर लगते ही सैकड़ों आंदोलनकारियों ने सोनादा थाना का घेराव करके मामला दर्ज करने की मांग करने लगे. मामला दर्ज करने में देरी होने के कारण देखते ही देखते आंदोलकारी उग्र होकर थाने में पथराव करने लगे. पुलिस द्वारा लाठी चार्ज करने के बाद देखते ही देखते आगजनी की कई घटनाएं हुईं. पथराव की वारदातें हुईं.

वहीं पुलिस की तरफ से भी आंसू गैस के गोले दागे गए और कई जगहों पर लाठी चार्ज किए गए. देखते ही देखते हिंसा की घटना पूरे पहाड़ के इलाकों में फैल गई. वहीं पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच जारी संघर्ष में एक और गोरखा की मौत हो गई. खबर है कि पांच पुलिस वाले भी गायब बताये जा रहे हैं. वहीं स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दार्जिंलिंग में सेना को बुला लिया गया है.

क्या कहते हैं बिमल गुरूंग:

वहीं गोजजुमो के प्रमुख विमल गुरूंग का कहना है कि बंगाल सरकार पहाड़ी इलाकों के शांत आंदोलन को अशांत करने पर आमादा है. एक सोची-समझी साजिश के तहत सरकार ऐसे काम कर रही है. इससे पहले भी 17 जून को तीन वीर गोरखाओं की मौत पुलिस की गोली से हुई थी. अभी अभी एक और निहत्थे गोरखे की मौत पुलिस की गोली से हुई है. जब तक इसकी सीबीआई जांच नहीं होगी, तब तक यहां आंदोलन जारी रहेगा.

बिहार पर भी है असर :

दार्जिलिंग शहर में बिहार के कामगारों की तादाद काफी ज्यादा है. वहां के चाय बागानों (टी—एस्टेट) से लेकर होटल उद्योग, ट्रांसपोर्ट सर्विस एवं विभिन्न सेवाक्षेत्रों में बिहार के लोग काम करते थे. वहां का माहौल उग्र, हिंसक और अशांत हो जाने से उन्हें रोजगार से तो वंचित होना पड़ा ही उनके जानपर बन आई. बाहरी लोगों के प्रति आक्रोश से वे स्वत: ही आंदोलनकारियों के निशाने पर आ गए. और उन्हें जान बचाकर वहां से पलायन को मजबूर होना पड़ा. उनके सामने अब आजीविका एवं बच्चों के भरण—पोषण का संकट है. उन्हें अपना भविष्य अधर में नजर आ रहा है. दार्जिलिंग से पलायन कर चुके लोगों को भी वहां शांति बहाली का बेसब्री से इंतजार है.