बेटी ने लेने से किया इनकार, दो दिनों से मोर्चरी में है पिता का शव

लाइव सिटीज डेस्क: खून के रिश्तों को सबसे गहरा और सबसे पवित्र रिश्ता माना जाता ​है. लेकिन लोगों ने इस रिश्ते का भी खून करके रख दिया है. मौके पर सबसे सगा भी दगा दे जाता है. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई इतना निष्ठुर हो सकता है कि अपने पिता की मौत से भी उसका दिल न पसीजे? जी हां, ऐसे लोग भी हैं इस दुनिया में.

कितना बदल गया इन्सान

कोलकाता में पिछले दो दिनों से एक 70 वर्षीय बुजुर्ग गौतम दत्ता का शव मॉर्चरी में रखा हुआ है. शव को कोई दावेदार नहीं है. किसी शव का दावेदार न होना भी कोई बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात यह है कि गौतम साहब लावारिस नहीं हैं. उनकी वारिस है. एक बिटिया हैं. एक प्रसिद्ध स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती हैं. शिक्षिका हैं. बौद्धिक हैं. उन्होंने अपने पिता का शव लेने से मना कर दिया है. उनके दामाद ने भी उनके दाह—संस्कार में कोई रूचि नहीं दिखाई है और शव स्वीकार करने से साफ मना कर दिया है.

एक रिश्ता यह होता है कि कोई रिश्ता न होते हुए भी लोग लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने से नहीं हिचकते. अंतिम संस्कार भी इन्सान का हक है. दूसरे भी इसे अदा करते हैं. और एक रिश्ता यह भी है जो ‘सगे’ बाप को भी लोग लावारिस हालत में छोड़ देते हैं. पिता का शव स्वीकार करने से बेटी के इन्कार पर पुलिस भी हैरान है. हैरानी की एक वजह यह भी है कि महिला सिर्फ किसी एक की बेेटी ही नहीं है. वह तो सैकड़ों की शिक्षिका भी है. और ऐसी शिक्षिका बच्चों को कैसी शिक्षा देंगी, पता नहीं. मृतक गौतम दत्ता वकालत करते थे. उनके साथी वकील भी बेटी की इस बेरूखी से हैरान—परेशान हैं. अब चूंकि बेटी—दामाद ने शव स्वीकार न करने के पीछे कोई कारण नहीं बताया है, इसलिए इसकी वजह भी रहस्य ही है.

बता दें कि वकील गौतम दत्ता भवानीपुर के निवासी थे और अलीपुर कोर्ट में वकालत करते थे. तबियत बिगड़ जाने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. लेकिन नियती को कुछ और मंजूर था. उन्हें बचाया नहीं जा सका. सोमवार की सुबह 10 बजे वह परलोक सिधार गए. अस्पताल प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन ने उनकी बेटी से संपर्क कर पिता का शव लेने को कहा तो रेस्पांस हैरानी कर देने वाला था. उन्होंने इससे साफ मना कर दिया. दिक्कत यह है कि उनकी ‘वारिस’ की अनुमति के बगैर शव किसी को सौंपा भी नहीं जा सकता. इस मामले ने न सिर्फ पुलिस, अस्पताल जैसी संस्था को बल्कि दरकती इंसानियत और वजूद खो रहे नैतिक मूल्य तक को दुविधा में डाल दिया ​है.

अलीपुर बार एसोसिएशन से जुड़े गौतम बाबू के सहकर्मी वकीलों ने दत्ता साहब की बेटी से संपर्क किया तो नतीजा शून्य ही निकला. समझाने—बुझाने की सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं. अब वे हम इस मामले में कोर्ट की मदद लेने की सोच रहे हैं. बहरहाल इस मामले ने रिश्तों को भी एक मुखौता ही साबित किया है जिसके नीचे छिपे व्यक्ति के निष्ठुर चेहरे से दुनिया वाकिफ नहीं हो पाती है और इस खुशफहमी में पड़ी रहती है कि वह मेरा अपना है, सगा है, मेरा खून है, जिगर का टुकड़ा है.

और जब सच सामने आता है तो खुशखहमी पालने वाले को कुछ पता नहीं चल पाता. वह तो दुनिया से विदा हो चुका होता है.