लाइव सिटीज डेस्क : देश में पकौड़ों पर गर्म हुई सियासत खत्म ही नहीं हो रही है. उधर पीएम ने पकौड़ा बेचने को रोजगार कह डाला और इधर उसपर कई राजनेताओं के तीखे वार चालू हो गए. और तो और सोशल मीडिया पर ऐसे ही कुछ मटीरियल मिलना चाहिए ताकि सब्जी और खिचड़ी पकनी अपने आप शुरु हो जाती है. पकौड़े वाले भी पीएम मोदी को कोसने लगे हैं. लेकिन हम आज आपको एक ऐसे पकौड़े वाले से मिलवाने जा रहे हैं जो 3 करोड़ तक के पकौड़े बेच रहे हैं.

हम बात कर रहे हैं बहादुरगढ़ (हरियाणा) के कारोबारी की जो कहते हैं पकौड़ों ने हमें समाज में सिर उठाकर जीने लायक जिंदगी दी. मानसिंह दुआ सन् 1947 में खाली हाथ पाकिस्तान से बहादुरगढ़ पहुंचे थे. चौक पर अंगीठी लगाई और दो, तीन व पांच पैसे में चार से आठ पकौड़े बेचने लगे. धीरे-धीरे स्वाद और सुगंध पड़ोसी राज्यों तक जा पहुंचा. अब उनके बेटे के बाद पोतों भी पकौड़ों का ही कारोबार कर रहे हैं.

पकौड़ों ने उनके पूरे परिवार की जिंदगी संवार दी. इसी तरह पंडित मुखराम शर्मा का परिवार भी पीढ़ी दर पीढ़ी पकौड़े बेच रहा है. देश में पकौड़ों पर गर्म हुई सियासत पर बहादुरगढ़ के कारोबारी कहते हैं कि पकौड़ों ने हमें समाज में सिर उठाकर जीने लायक जिंदगी दी.

2 दुकानों से शुरू हुआ सिलसिला, सालाना टर्नओवर 3 करोड़

पकौड़ा पांच फीसदी जीएसटी के साथ पांच हजार रुपए रोज की कमाई दिला रहा है. हमने न व्यापार बदला और न ही कभी शर्म महसूस की. यहां 2 दुकानों से शुरू हुआ सिलसिला अब 18 तक पहुंच गया है, जिनसे 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है. यहां पकौड़ा कारोबार का सालाना टर्नओवर 3 करोड़ रुपए से अधिक है. बहादुरगढ़ सिटी के मेन चौक का नाम ही पकौड़ा चौक हो गया है, जो कभी लाल चौक के नाम से फेमस था.

बंटवारे के बाद बहादुरगढ़ में खोली दुकान

1947 में मानसिंह दुआ ने लाल चौक पर पकौड़े बेचने शुरू किए. पिता बंटवारे से पहले पुराने पंजाब में पकौड़े ही बेचते थे. मानसिंह के निधन के बाद उनके बेटे बिल्लू ने दुकान संभाली व अब बिल्लू के बेटे अमित व सचिन ने काम संभाला. अमित ने बताया कि आज 350 रुपए किलो पकौड़े 5 फीसदी जीएसटी के साथ बिक रहे हैं. आज परिवार पूरी तरह से सम्पन्न है. पकौड़ा व्यापारी 50 हजार रुपए तक किराया दे रहे हैं.

1950 में शुरू किया कारोबार

जटवाड़े के पंडित मुखराम शर्मा ने 1950 में लाल चौक पर ही पकौड़े की दुकान सजाई. आज मुखराम के पोते संजय व प्रवीण बिजनेस संभाले हुए हैं. संजय शर्मा ने बताया कि पकौड़े बेचना भले ही छोटा काम माना जाता हो, लेकिन सच्चाई है कि पकौड़े बेचकर ही परिवार आज पूरी तरह से साधन सम्पन्न है.

सरकारी जॉब भी ठुकरा दी सुरेश ने

महेंद्र पकौड़े वाले के नाम से पहचाने जाने वाले सुरेश को बीकॉम के बाद नौकरी नहीं मिली. उन्होंने 1972 में शहर के मेन मार्केट में 10 रुपए उधार लेकर पकौड़ों की रेहड़ी लगा ली. पहले ही दिन 26 रुपए के पकौड़े बिक गए. देखते ही देखते 25 साल निकल गए. जब वह हर रोज 100 से 200 तक कमा लेते थे, तब पूसा एग्रीकल्चर सिसर्च सेंटर से गवर्नमेंट जॉब का लेटर आया. वे नौकरी करने नहीं गए. इसी पकौड़े से घर तैयार किया, दुकान ली. अब एक बेटा मैनेजर है और दूसरा प्रोफेसर.

पकौड़ों के दीवाने भी हैं बड़े लोग

बहादुरगढ़ के चौक पर पकौड़े खाने के शौकीनों में पूर्व चीफ मिनिस्टर देवीलाल, बंसीलाल और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ-साथ फिल्म एक्टर राजेश खन्ना, भीम का रोल करने वाले प्रवीण कुमार भी शामिल हैं. भूपेंद्र सिंह हुड्डा तो यहां सड़क पर ही खड़े होकर पकौड़ों का आनंद लेते थे. पकौड़ों में यहां 12 तरह के पकौड़ों की डिमांड है.

66 साल से बद्रीनाथ के पकौड़े मशहूर

हरियाणा के हांसी डिस्ट्रिक्ट के छाबड़ा चौक पर लाला बद्रीनाथ के नाम से 66 साल पुरानी दुकान है. बद्रीनाथ की तीसरी पीढ़ी दुकान चला रही है, लेकिन नाम और पकौड़ों का स्वाद वही बरकरार रखा है. मालिक रोहित परूथी बताते हैं कि धनिये-प्याज की चटनी को आज भी कुंडी सोटे से बनाते हैं. रेसिपी भी दादा के जमाने की है.

1858 में शुरू हुई मिट्ठन दी मिठाई, पांचवीं पीढ़ी रही संभाल

पानीपत डिस्ट्रिक्ट में मिट्ठन दी मिठाई का 1858 में लाला केवल राम ने बेटे मिट्ठन लाल के जन्मदिन के साथ ही शुरू की थी. पिता के बाद लाला मिट्ठन लाल ने काम को और भी ज्यादा पहचान दी. अब यह काम मिट्ठन परिवार की पांचवीं पीढ़ी के हाथों में आ गया है.

जिंदल की फरमाइश पर बना बैंगन का पकौड़ा

हिसार डिस्ट्रिक्ट के नागोरी गेट पर पकौड़े वाले मदन एक क्विंटल से ज्यादा के पकौड़े बेच देते हैं. 1998 में सिटी के नेता होशियारी मल बंसल की बेटी की शादी थी. इसमें ओपी जिंदल पहुंचे और बैंगन के पकौड़े खाने की इच्छा जताई. तभी स्पेशल बैंगन के पकौड़े तैयार करवाए.