गुजरात में नाराज लोग BJP को छोड़ना नहीं, बस ‘औकाद’ दिखाना चाहते हैं

लाइव सिटीज, पटना : नीतीश चंद्रा न्यूज़ चैनल ‘इंडिया टीवी’ के बिहार संवाददाता हैं. हाल में वे गुजरात इलेक्शन कवर करने गए हुए थे. गुजरात चुनाव ख़त्म हो चुके हैं. कल सोमवार 18 दिसंबर को की दोपहर तक गुजरात के भाग्य का फैसला हो भी जाएगा. इन चुनावों के बारे में अखबार-टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक बहुत कुछ कहा-सुना-लिखा जा चुका है. उनपर बात करना अब बेमानी है. फिलहाल नीतीश चंद्रा ने गुजरात से आकर बहुत कुछ लिखा है. खासे डिटेल में बताया है कि गुजरात में आखिर क्यों तमाम हंगामे के बाद भी एग्जिट पोल्स में भाजपा जीतती हुई दिख रही है. आगे पढ़िए उन्हीं के शब्दों में पूरी कहानी…

‘गुजरात में सभी एग्जिट पोल के नतीजों में बीजेपी की सरकार बनती दिख रही है. हालांकि चुनाव के दौरान मुकाबला कांटे का कहा जा रहा था लेकिन आखिरकार बाजी बीजेपी मार ले जाती दिख रही है. वो भी तब जब 3 लड़कों की काफी चर्चा हो रही थी. प्रभावशाली माने जाने वाले पटेल खासे नाराज बताये जा रहे थे. 22 साल की एंटी इनकंबेंसी भी थी. GST और नोटबंदी से गुजरात के व्यापारी वर्ग के परेशान होने की बात कही जा रही थी. दो साल पहले हुए पंचायत चुनाव में कांग्रेस को अच्छी सफलता भी मिली थी. 2012 में दोनों दलों के वोट शेयर में बहुत ज्यादा का अंतर भी नहीं था और कई सीटों पर उम्मीदवारों की जीत का फासला भी कम था. फिर भी बीजेपी कैसे जीत गयी?



एक बात जो इस चुनाव में साफ तौर पर दिखी वो ये कि पहले चरण के मतदान तक चुनाव की स्पष्ट तस्वीर नहीं दिख रही थी. 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी मैं गुजरात आया था, उस समय नतीजे को लेकर अनुमान लगाना उतना मुश्किल नहीं था जितना इस बार लग रहा है. फिर भी वोटिंग के दौरान और उसके बाद सामने आई कुछ बातें अब संकेत दे रही हैं कि गुजरात में 2017 के चुनाव में क्या कुछ होने जा रहा है.

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वोट डालने के बाद प्रधानमंत्री मोदी

इसमें कोई संदेह नहीं कि पाटीदार यदि पूरी तरह कांग्रेस के साथ आ जाते तो शायद पासा पलट भी सकता था. लेकिन एक तो ऐसा हुआ नहीं और दूसरा ये कि पाटीदारों की नाराजगी से जितना नुकसान बीजेपी को हुआ उससे कहीं ज्यादा वोट पटेलों के वर्चस्व और ओबीसी आरक्षण में सेंधमारी की आशंका को लेकर ओबीसी जातियों का जुड़ गया.

दरअसल कांग्रेस को जिन तीन लड़कों – हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश से काफी उम्मीद थी उनको लेकर शुरू से ही गलत आकलन भी किया जाता रहा. मीडिया में भी उन्हें जिस तरीके से प्रोजेक्ट किया जाता रहा, दरअसल वैसा था ही नहीं. सामाजिक आंदोलन के समय जैसा माहौल था, चुनाव आने तक उसमें काफी बदलाव आ चुका था. मीडिया में हार्दिक पटेल को पूरे गुजरात मे पटेलों के चेहरे के तौर पर, अल्पेश को ओबीसी आंदोलन से उपजे ओबीसी नेता के तौर पर और जिग्नेश को गुजरात के दलित चेहरे के तौर पर देखा गया. लेकिन वास्तविकता ये थी कि गुजरात के कुछ खास हिस्से में ही और वो भी विभाजित तरीके से इनकी पकड़ थी.

हार्दिक की पकड़ जहां थी भी, वहां भी कई तरह का विभाजन था. ग्रामीण इलाकों में पटेल साथ दिख रहे थे तो शहरी पटेलों में वो आकर्षण नहीं था. गाँवों में भी युवा हार्दिक के साथ थे तो 35 पार के पटेल कई कारणों से उनसे प्रभावित नही रहे. आंदोलन के दौरान जरूर हार्दिक कड़वा और लेउवा का भेद मिटाने में कामयाब रहे, लेकिन कांग्रेस का साथ देने के बाद ये विभेद भी फिर से पनप गया.

पिछले डेढ़ महीने से पूरे गुजरात मे घूमने और लोगों से हुई बातचीत के आधार पर एक बात और साफ कर दूं, जो भी पटेल हार्दिक के प्रभाव में कांग्रेस के साथ खड़े दिख रहे थे वे आरक्षण की उम्मीद को लेकर या कांग्रेस और राहुल से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि लाठीचार्ज, पिटाई और गोली चलाने की घटना से मर्माहत होकर साथ खड़े थे. आंदोलन के दौरान जिस तरह से लाठीचार्ज हुआ, गोलियां चली, 14 लड़के मारे गए. इस घटना ने ही उनको काफी तकलीफ पहुंचाई. बस इसी घटना ने उनमें वो गुस्सा भर दिया. वे बीजेपी को सबक सिखाना चाहते थे. लेकिन इस घटना को लेकर उनमें नाराजगी थी भी तो नरेंद्र मोदी से नहीं बल्कि गुजरात बीजेपी के नेताओं और अमित शाह से थी. यानि यदि ये घटना नहीं हुई होती तो सिर्फ आरक्षण के लॉलीपॉप के आधार पर पटेलों का साथ कांग्रेस को नही मिलने वाला था क्योंकि आरक्षण की हकीकत पटेल समझ चुके थे.

इसमें कोई संदेह नहीं कि सामाजिक आंदोलन के दौरान पटेलों का भरपूर साथ हार्दिक को मिला. लेकिन बाद में हार्दिक के कांग्रेस के साथ जाने, चुपके-चुपके कांग्रेस से टिकटों की डील और फिर सीडी की सीरीज ने उसमें थोड़ी गिरावट भी ला दी. लेकिन मीडिया में हार्दिक को इस तरह से प्रोजेक्ट किया जाता रहा, मानो वो पूरे गुजरात मे पटेलों का चेहरा हो. पटेलों के किंग मेकर होने के इस इम्प्रेशन ने पटेलों से चिढ़ने वाली कई दूसरी और ओबीसी जातियों को बीजेपी के पक्ष में गोलबंद कर दिया.

यही बात अल्पेश और जिग्नेश पर भी लागू होती है. अल्पेश पूरे गुजरात के ठाकोरों के नेता के तौर पर नहीं उभर सके. जिन इलाकों में उनकी पकड़ थी भी वहां भी ठाकोरों के वोट में विभाजन दिखा. जिग्नेश को तो कई दलित बहुल इलाकों में लोग जानते भी नही हैं. वैसे भी ठाकोरों और दलितों का वोट कांग्रेस को पहले से भी मिलता रहा है इसलिए कांग्रेस के वोट प्रतिशत में कोई बहुत निर्णायक बढ़त इनकी वजह से नही हुई.

रही बात एंटी इनकंबेंसी की, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि 22 साल के बाद ये गुजरात में दिख रहा था. खासकर पिछले 3 सालों में नरेंद्र मोदी के दिल्ली जाने के बाद की सरकार के कामकाज को लेकर लोगों में काफी नाराजगी थी. कई जगहों पर मुझे लोगों ने कहा कि ‘कोई सुनता नही है’. मोदी के दिल्ली जाने के बाद नयी सरकार की वो हनक नही रह गयी और नौकरशाही भी अपने मिजाज से चलने लगी. किसानों से फसल की कीमत का जो वादा किया गया वो पूरा नही हो पाया. लेकिन नाराजगी का भी दो स्तर देखने को मिला. कुछ लोग बीजेपी को सबक सिखाना जरूरी मानते थे, लेकिन अधिकांश ऐसे थे जो नाराज तो थे, लेकिन इतने भी नाराज नही थे कि वे कांग्रेस को वोट दे दें.

कुछ लोगों की राय ये थी कि वे बीजेपी को छोड़ना तो नहीं चाहते लेकिन उनको थोड़ी ‘औकाद’ दिखाना जरूर चाहते हैं. वे चाहते थे कि बीजेपी की सरकार तो आये लेकिन उनकी सीटें बहुत ज्यादा नहीं आये, ताकि उनको अपनी गलती का एहसास हो सके और कुछ खास नेताओं की ‘एरोगेंसी’ पर लगाम लग सके. नाराजगी के इस हल्के और छूट देने वाले तेवर ने बीजेपी को थोड़ी राहत दे दी. अन्यथा मामला बिगड़ भी सकता था. और फिर इस सोच ने भी नाराजगी वाले तेवर को थोड़ा ढीला और ठंडा करने में काफी सहयोग दिया कि जब केंद्र में भी बीजेपी की सरकार हो तो भला यहां उल्टी सरकार लाने का क्या फायदा. ये डर भी कि ऐसा हुआ तो बदले की भावना से केंद्र की तरफ से कोई मदद नहीं मिलेगी और गुजरात में अशांति का दौर भी लौट सकता है.

GST और नोटबंदी को लेकर भी जितनी नाराजगी शुरू में दिख रही थी वैसा अंतिम समय तक बना नही रहा. नोटबंदी तो अब मुद्दा था भी नही. हाँ, GST को लेकर जरूर नाराजगी थी लेकिन बीजेपी की तरफ से बाद में दी गयी राहत और बीजेपी नेताओं की तरफ से मनाने- समझाने के चले कई दौरों के बाद व्यापारी मान गए. सूरत के व्यापारी भी सारी नाराजगी मीडिया के सामने रखते तो थे लेकिन आखिर में वोट देने के सवाल पर मुहं से बीजेपी ही निकलता था. सूरत में अरुण जेटली की तरफ से बुलाई गई मीटिंग में काफी व्यापारी आये और वो उनका भरोसा जीतने में कामयाब भी रहे. सच पूछिए तो गुजरात का व्यापारी वर्ग कांग्रेस के दौर की अपनी मुश्किलों को याद कर आज भी बीजेपी से अलग होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है. गुजरात में शांति और बेहतर कानून व्यवस्था ही वो पूंजी है जिससे व्यापारी फल-फूल रहे हैं. इसमें किसी नए प्रयोग का रिस्क शायद वो अभी लेना नही चाहते हैं.

अंतिम कुछ दिनों में मोदी के ‘गुजरात प्राइड’ वाली अपील ने भी काम किया. गुजरात में मोदी की हार का मतलब दिल्ली में भी मोदी के कमजोर होने जैसी बात लोगों को समझ मे आयी. कुल मिलाकर ‘चलो माफ किया’ वाले अंदाज में वोटरों ने 22 साल की एंटी इनकंबेंसी को नजरअंदाज़ करके बीजेपी को एक और मौका दे दिया. लेकिन ये चुनाव बीजेपी के लिए एक वार्निंग तो है ही. अगली बार सब कुछ दुरुस्त नही हुआ तो शायद मोदी का चेहरा भी उनको नहीं बचा सकेगा.’

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