विवादित ट्वीट मामले में फराह अली खान को पटना हाईकोर्ट से राहत

पटना : पटना हाईकोर्ट ने मुम्बई की आभूषण डिजाइनर फराह अली खान को एक बड़ी राहत प्रदान करते हुए उनके द्वारा हिट एंड रन मामले में फैसला आने बाद किये गये विवादित ट्वीट के आधार पर मुजफ्फरपुर में दर्ज किये गये प्राथमिकी को सुनवाई के बाद रद्द करने का आदेश दिया. 

न्यायाधीश बिरेन्द्र कुमार की एकलपीठ ने फराह अली खान की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त निर्देश दिया. गौरतलब है कि मुजफ्फरपुर (बिहार) की जिला अदालत ने बॉलीवुड गायक अभिजीत मुखर्जी और आभूषण डिजाइनर फराह अली खान के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करना का आदेश दिया था. यह आदेश, 2002 के हिट एंड रन केस में सलमान खान की दोषसिद्धि के बाद सडक पर सोने वाले लोगों पर उनकी टिप्पणी के लिए दिया गया था.

अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा की शिकायत पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट राम चंद्र प्रसाद ने आदेश दिया था कि दोनों के खिलाफ यहां के काजी मोहम्मदपुर थाने में दंगा भडकाने और दो समूहों में कटुता बढाने के विभिन्न अपराधों के तहत प्राथमिकी दर्ज किया जाय. इस थाने का चुनाव इसलिए किया गया था क्योंकि शिकायतकर्ता ने घटना की जगह छत्तापुर बताई थी, जहां से उन्होंने वो समाचार पत्र खरीदा था, जिसमें उन्होंने दोनों द्वारा की गई अपमानित करने वाली टिप्पणी पढी थी. 

इसके बाद उन्होंने अदालत का रुख किया था. अदालत ने आदेश दिया था कि प्राथमिकी भारतीया दंड संहिता की धारा 153 (दंगा भडकाना), 153 ए (दो समूहों के बीच कटुताबढाना), 504 (जानबूझकर शांति भंग करना) और 506 (आपराधिक धमकी देना) के तहत दर्ज की जाए. शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि वह गायक की अपमानजनक टिप्पणी से आहत हुए है, जिसे उसने टीवी चैनलों पर देखा और अखबारों में
पढा था.

ओझा ने बताया कि हिट एंड रन मामले में सलमान खान को अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद अभिजीत और फराह अली  खान ने सड़क पर सोने वाले लोगों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. इसी मामले को लेकर अदालत में एक परिवाद पत्र दाखिल किया गया था.
निचली अदालत के प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश के विरूद्ध फराह खान ने हाईकोर्ट में प्राथमिकी को रद्द करने हेतु याचिका दायर की थी. याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि निचली अदालत में जो परिवाद पत्र दाखिल किया गया है उसे दाखिल किये जाने में विहित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है.

अदालत को बताया गया कि उक्त परिवाद पत्र बगैर शपथ पत्र के दायर की गयी है. यही नहीं परिवादी ने शिकायती मामला दायर करने में विहित प्रक्रियाओं के तहत उक्त बातों का भी उल्लेख नहीं किया गया है जिसके तहत मामले को लेकर थाना में शिकायत किया जाता है और यदि वहां शिकायत दर्ज नहीं होती है तो फिर वरीय पदाधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज की जाती है. परंतु परिवादी ने इसका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है. जो कि परिवाद पत्र के दाखिल किये जाने की प्रक्रिया के विरूद्ध है.

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